न्यायिक उपेक्षा या संस्थागत उदासीनता? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस और सरकारी अधिवक्ता की लापरवाही पर जताई कड़ी नाराजगी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक कड़े फैसले में पुलिस और सरकारी अधिवक्ताओं की अक्षमता और न्यायिक आदेशों की अनदेखी को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। शानू सक्सेना और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (आवेदन संख्या 482/42213/2024) मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की पीठ के समक्ष हुई। इस निर्णय ने न्यायिक आदेशों के अनुपालन में गंभीर खामियों और कानूनी प्रक्रिया की विफलता को उजागर किया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पुलिस अधिकारियों द्वारा न्यायिक आदेशों के अनुपालन में विफलता से जुड़ा है, जिससे कानूनी कार्यवाही में अनावश्यक देरी हो रही थी। हाईकोर्ट ने 31 जनवरी 2025 को अपने पूर्व आदेश में फतेहपुर के पुलिस अधीक्षक, श्री धवल जायसवाल को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर स्पष्टीकरण सहित शपथ पत्र जमा करने का निर्देश दिया था। यह आदेश विजय कुशवाहा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में पहले दिए गए निर्देशों की पृष्ठभूमि में जारी किया गया था, जिसमें न्यायिक आदेशों के अनुपालन में प्रणालीगत विफलताओं को उजागर किया गया था।

हालांकि, प्रस्तुत अनुपालन शपथ पत्र (Compliance Affidavit) संतोषजनक नहीं पाया गया। इसके बाद, अदालत ने श्री ए.के. सैंड, सरकारी अधिवक्ता और उनके कार्यालय की भूमिका की गहन जांच की।

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मुख्य कानूनी मुद्दे

1. पुलिस द्वारा न्यायिक आदेशों का अनुपालन न करना

अदालत ने पुलिस अधिकारियों की निरंतर लापरवाही और अपने कर्तव्यों की अवहेलना पर गहरी चिंता जताई और टिप्पणी की:

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“उनकी उदासीनता और अक्षमता के कारण कानूनी मामलों में अनावश्यक विलंब हो रहा है, जिससे पहले से ही लंबित मामलों का बोझ और बढ़ रहा है। यह त्वरित न्याय वितरण प्रणाली को गंभीर रूप से बाधित करता है।”

2. शपथ पत्र में हेरफेर और प्रक्रियात्मक अनुचितता

सरकारी अधिवक्ता श्री ए.के. सैंड द्वारा तैयार किए गए शपथ पत्र में पहली पृष्ठ को श्री घनश्याम कुशवाहा (सरकारी अधिवक्ता के निजी सचिव) के निर्देश पर बदला गया था, जिससे कोर्ट को भ्रमित करने की कोशिश की गई। अदालत ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:

“ऐसे आधिकारिक रिकॉर्ड में की गई हेरफेर न केवल अनुचित शक्ति के दुरुपयोग को दर्शाती है, बल्कि सरकारी अधिवक्ता कार्यालय में प्रक्रियात्मक शुचिता की पूर्ण उपेक्षा को भी उजागर करती है।”

3. सरकारी अधिवक्ताओं की लापरवाही और कानूनी ज्ञान की कमी

कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि न तो पुलिस अधीक्षक और न ही सरकारी अधिवक्ता को विजय कुशवाहा मामले में दिए गए पहले के निर्णय की जानकारी थी, जो कि इस मामले में प्रासंगिक था। कोर्ट ने कहा:

“अधिकारियों द्वारा एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालने की यह प्रवृत्ति सरकार की कानूनी प्रणाली में समन्वय और सतर्कता की कमी को दर्शाती है और न्यायिक आदेशों के प्रति संस्थागत उदासीनता को उजागर करती है।”

अदालत की कड़ी टिप्पणियां और निर्देश

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में अधिकारियों के कर्तव्य पालन में लापरवाही की निंदा करते हुए कहा:

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“न्यायपालिका, अपने सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद, अकेले प्रभावी रूप से कार्य नहीं कर सकती; यह न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए पुलिस सहित विभिन्न हितधारकों के समन्वय पर निर्भर करती है। पुलिस की यह विफलता एक संस्थागत उदासीनता और अक्षमता की धारणा को जन्म देती है, जो जनता के न्याय प्रणाली में विश्वास को कमजोर करती है।”

इसके अलावा, शपथ पत्र में की गई हेराफेरी को न्यायालय से छल के समान मानते हुए अदालत ने कहा कि सरकारी अधिवक्ता का निजी सचिव घनश्याम कुशवाहा केवल एक लिपिकीय (clerical) कर्मचारी है, और उसे किसी भी कानूनी दस्तावेज में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है

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आगे की कार्रवाई

फतेहपुर के पुलिस अधीक्षक को 12 मार्च 2025 की अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के आदेश दिए गए।
एक संशोधित, विस्तृत और सही शपथ पत्र प्रस्तुत करने के लिए समय दिया गया।
न्यायालय रजिस्ट्रार (अनुपालन) को आदेश दिया गया कि वह इस निर्णय को तत्काल सरकारी अधिवक्ता श्री ए.के. सैंड को संप्रेषित करें।

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