उत्तराखंड हाईकोर्ट का फैसला: केवल नशे की लत मानसिक बीमारी नहीं, अवैध केंद्र में 42 दिन से बंद व्यक्ति को रिहा करने का आदेश

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने देहरादून स्थित एक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में 42 दिनों से रखे गए एक व्यक्ति को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शराब या गांजे की लत को सीधे तौर पर मानसिक बीमारी नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने पाया कि संबंधित व्यक्ति को भर्ती करने में वैधानिक कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह उल्लंघन किया गया था।

जस्टिस रवींद्र मैठाणी और जस्टिस सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने 23 सितंबर को बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका का निपटारा करते हुए यह निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पीड़ित व्यक्ति से सीधी बातचीत की। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने घर लौटने की स्पष्ट इच्छा जताई है, इसलिए अदालत के पास उसे मुक्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और वह जहां चाहे जाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

तलाक विवाद और जबरन भर्ती

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गौरव सिंह अदालत में पेश हुए। याचिका में आरोप लगाया गया था कि संबंधित व्यक्ति को उसकी सहमति और इच्छा के विरुद्ध मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में बंधक बनाकर रखा गया था। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने जजों को बताया कि उसकी पत्नी के साथ तलाक को लेकर विवाद चल रहा था, जिसके बाद उसकी पत्नी ने उसे जबरन इस केंद्र में भर्ती करा दिया था।

अनिवार्य मेडिकल प्रमाण पत्र का अभाव

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हाईकोर्ट ने मामले में कानूनी प्रक्रियाओं की पड़ताल करते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। कानून के मुताबिक, किसी भी व्यक्ति को उसकी मर्जी के बिना भर्ती करने से पहले एक मनोचिकित्सक और एक अन्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर या चिकित्सक द्वारा स्वतंत्र जांच जरूरी है। दोनों विशेषज्ञों का स्वतंत्र रूप से इस निष्कर्ष पर पहुंचना अनिवार्य है कि व्यक्ति गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रस्त है।

जब खंडपीठ ने केंद्र के वकील से पूछा कि क्या भर्ती से पहले ऐसा कोई प्रमाण पत्र हासिल किया गया था, तो वकील ने इससे इनकार किया। इस पर अदालत ने माना कि व्यक्ति के मानसिक रूप से बीमार होने का कोई वैध मेडिकल प्रमाण पत्र मौजूद नहीं था।

अदालत ने संबंधित मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) द्वारा 22 सितंबर को सौंपी गई रिपोर्ट का भी अवलोकन किया। रिपोर्ट में दर्ज था कि व्यक्ति गांजा और शराब का आदी है। इस पर खंडपीठ ने रेखांकित किया कि सिर्फ नशे की लत को मानसिक बीमारी करार नहीं दिया जा सकता; इसके लिए किसी मनोचिकित्सक या अधिकृत चिकित्सा विशेषज्ञ का प्रमाणित निष्कर्ष होना आवश्यक है।

अवैध रूप से चल रहे केंद्र पर होगी कार्रवाई

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मानसिक स्वास्थ्य केंद्र के वकील ने दलील दी कि संबंधित व्यक्ति को 12 अगस्त को केंद्र लाया गया था, जहां एक डॉक्टर ने उसकी जांच की थी। जांच में शराब व नशे से जुड़ी दिक्कतें पाई गई थीं और उसी दिन ब्लड टेस्ट भी कराया गया था, जिसके आधार पर उसे भर्ती करना जरूरी समझा गया। केंद्र ने यह भी दावा किया कि उनके यहां ऑन-कॉल डॉक्टर उपलब्ध रहते हैं और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के नियमों के तहत वह जब चाहे जाने के लिए स्वतंत्र था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र की वैधानिक स्थिति की भी समीक्षा की। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए देहरादून के जिलाधिकारी ने अदालत को बताया कि केंद्र संचालित था और वहां 28 अन्य लोग भी रह रहे थे।

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प्रशासनिक जांच में सामने आया कि केंद्र का पंजीकरण 9 अगस्त 2025 को समाप्त हो चुका था और नवीनीकरण का आवेदन अभी लंबित था। जिलाधिकारी ने अदालत को यह भी अवगत कराया कि केंद्र ने हाल ही में बिना किसी कानूनी अनुमति के अपना संचालन स्थल बदल लिया था और उसके पास केंद्र चलाने का कोई वैध अधिकार नहीं था। जिलाधिकारी ने बताया कि प्रशासन मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के तहत इस केंद्र के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।

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