‘मोहम्मद दीपक’ विवाद: उत्तराखंड हाईकोर्ट का एफआईआर रद्द करने से इनकार, पुलिस को दिए ‘अर्नेश कुमार’ गाइडलाइंस के पालन के निर्देश

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार को उस जिम मालिक के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसने जनवरी में दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं के साथ बहस के दौरान खुद को “मोहम्मद दीपक” बताया था। अदालत ने मामले की जांच जारी रखने की अनुमति देते हुए राज्य पुलिस को सख्त निर्देश दिए कि वे सात साल से कम सजा वाले अपराधों के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य’ मामले में निर्धारित गाइडलाइंस का पूरी तरह पालन करें।

जस्टिस राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए दीपक कुमार को इस मामले से संबंधित किसी भी प्रकार की सोशल मीडिया टिप्पणी करने से भी रोक दिया। कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर इस तरह की सक्रियता चल रही पुलिस जांच में बाधा डाल सकती है।

यह पूरा मामला 26 जनवरी की एक घटना से जुड़ा है, जब जिम मालिक दीपक कुमार ने कुछ हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं और एक बुजुर्ग मुस्लिम दुकानदार के बीच हो रहे विवाद में हस्तक्षेप किया था। आरोप है कि कार्यकर्ता दुकानदार पर अपनी दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटाने का दबाव बना रहे थे, क्योंकि उनका दावा था कि इस शब्द का जुड़ाव हिंदू आस्था से है।

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बहस के दौरान जब कार्यकर्ताओं ने दीपक से उसका नाम पूछा, तो उसने एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए अपना नाम “मोहम्मद दीपक” बताया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था, जिसके बाद कार्यकर्ताओं की शिकायत पर दीपक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया। इसके बाद दीपक कुमार को सोशल मीडिया पर काफी विरोध और जान से मारने की धमकियों का सामना करना पड़ा, जिसके चलते उसने एफआईआर रद्द करने, पुलिस सुरक्षा और संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एफआईआर केवल एकजुटता दिखाने के उसके वैध अधिकार के कारण दर्ज की गई है और पुलिस इस मामले में पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रही है। सोशल मीडिया पर रोक के सवाल पर वकील ने कहा, “हर कोई सोशल मीडिया पर है। मैंने क्या अवैध किया है? क्या मैंने कुछ असंवैधानिक कहा? यह कोई अपराध नहीं है।”

दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि एफआईआर में लगाई गई धाराएं सात साल से कम की सजा वाली हैं। राज्य ने यह भी दावा किया कि कुमार जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं और “सोशल मीडिया पर व्यस्त” हैं, जिससे जांच प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।

जस्टिस थपलियाल ने कहा कि हालांकि याचिकाकर्ता को एफआईआर को चुनौती देने का अधिकार है, लेकिन जांच को उसके स्वाभाविक निष्कर्ष तक पहुंचना चाहिए। पुलिस सुरक्षा की मांग पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

“याचिकाकर्ता जांच के दायरे में हैं और ऐसी परिस्थितियों में वे पुलिस सुरक्षा की प्रार्थना नहीं कर सकते। जांच एजेंसी पर संदेह करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। उन्हें आशा और विश्वास रखना चाहिए कि उनके जीवन की रक्षा की जाएगी।”

अदालत ने जांच अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग को भी इस स्तर पर “पूरी तरह से अनुचित” बताया। कोर्ट ने कहा:

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“इससे न केवल चल रही जांच प्रभावित होगी, बल्कि जांच एजेंसी के मनोबल पर भी असर पड़ेगा।” कोर्ट का मानना था कि जांच का सामना कर रहा व्यक्ति उन्हीं अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग नहीं कर सकता जो मामले की जांच कर रहे हैं।

हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देशों के साथ याचिका का निपटारा किया:

  1. अर्नेश कुमार गाइडलाइंस का पालन: जांच अधिकारी (IO) कानूनी रूप से बाध्य है कि वह सुप्रीम कोर्ट के ‘अर्नेश कुमार’ फैसले का पालन करे, जिसके तहत छोटे अपराधों में सीधे गिरफ्तारी के बजाय आरोपी को नोटिस जारी करना अनिवार्य है।
  2. सोशल मीडिया पर रोक: कोर्ट ने दीपक कुमार को 26 जनवरी की घटना या चल रहे मामलों के संबंध में सोशल मीडिया पर संदेश, वीडियो या टिप्पणी पोस्ट करने से रोक दिया है।
  3. जांच में सहयोग: याचिकाकर्ता को पुलिस के साथ सहयोग करने और “कोई समस्या पैदा न करने” का निर्देश दिया गया है।
  4. सुरक्षा के लिए विकल्प: तत्काल सुरक्षा प्रदान करने से इनकार करते हुए बेंच ने कहा कि यदि कुमार को अपने जीवन पर कोई वास्तविक खतरा महसूस होता है, तो वे सक्षम पुलिस अधिकारियों के पास जाने के लिए स्वतंत्र हैं।

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