त्रिवेणी घाट पर गंगा आरती विवाद: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने श्री गंगा सभा को सशर्त दी आरती जारी रखने की अनुमति

त्रिवेणी घाट पर गंगा आरती को लेकर चल रहे विवाद के बीच उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार को श्री गंगा सभा को सशर्त यह धार्मिक अनुष्ठान जारी रखने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने ऋषिकेश नगर निगम के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें सभा को आरती करने से मना किया गया था। अगली सुनवाई 25 मार्च को होगी।

यह मामला तब उठा जब ऋषिकेश नगर निगम ने एक प्रस्ताव पारित कर श्री गंगा सभा को गंगा आरती करने से रोकने का आदेश जारी किया। निगम का तर्क था कि सभा का पंजीकरण समाप्त हो चुका है, जिससे उसके पास अब आरती करने का कोई वैध अधिकार नहीं है।

इसके अलावा, निगम ने सभा पर व्यावसायिक शोषण, दुकानदारों से कमीशन वसूली, और घाट पर गंदगी फैलाने जैसे आरोप भी लगाए।

नगर निगम के आदेश को चुनौती देते हुए श्री गंगा सभा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। सभा ने तर्क दिया कि गंगा आरती न केवल धार्मिक कर्मकांड है बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत है, जिसे अचानक रोका जाना अनुचित है।

न्यायमूर्ति आशीष नैंथानी की एकलपीठ ने अवकाशकालीन सुनवाई में कहा कि गंगा आरती केवल धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत का हिस्सा है। उन्होंने कहा:

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“इतिहास से चली आ रही परंपरा को बिना वैकल्पिक व्यवस्था के एकाएक बंद कर देना जनहित में नहीं है। इससे श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भारी असुविधा होगी।”

हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि श्री गंगा सभा का पंजीकरण समाप्त हो चुका है और उसे स्थायी रूप से आरती करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। बावजूद इसके, अस्थायी व्यवस्था के रूप में आरती को जारी रखने की अनुमति दी गई है।

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हाईकोर्ट ने श्री गंगा सभा को आरती की अनुमति देते हुए कुछ कड़े निर्देश भी जारी किए:

  • कोई प्रवेश शुल्क नहीं: सभा श्रद्धालुओं से आरती में भाग लेने या उसे देखने के लिए कोई प्रवेश शुल्क या चंदा नहीं वसूलेगी।
  • दुकानदारों से कोई वसूली नहीं: सभा फूल, दीप, कपूर आदि बेचने वाले दुकानदारों से बिना नगर निगम की अनुमति के कोई कमीशन या किराया नहीं ले सकेगी।
  • स्वच्छता की पूर्ण जिम्मेदारी सभा पर: आरती के बाद घाट की सफाई, फूलों, कपूर और तेल आदि के अवशेषों का उचित और पर्यावरण के अनुकूल निपटान अनिवार्य होगा। गंगा नदी को प्रदूषित होने से रोकने की जिम्मेदारी सभा की होगी।
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अगली सुनवाई 25 मार्च 2026 को निर्धारित है, जिसमें हाईकोर्ट यह देखेगा कि श्री गंगा सभा ने उसके निर्देशों का पालन किया या नहीं। तब तक नगर निगम का निषेध आदेश प्रभावी नहीं रहेगा।

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