यूपी रीट: रेरा के तहत देरी के लिए वैधानिक ब्याज से बचने के लिए प्रमोटर अनुबंध की शर्तों का सहारा नहीं ले सकते

उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट अपीलीय न्यायाधिकरण (UP REAT) ने यह स्पष्ट किया है कि एक बार जब कोई प्रोजेक्ट रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 (रेरा) के तहत पंजीकृत हो जाता है, तो प्रमोटर कानूनी रूप से निर्धारित दर पर देरी के लिए ब्याज देने के लिए बाध्य है, जो किसी भी विपरीत संविदात्मक समझौते (Contractual Agreement) पर प्रभावी होगा। जस्टिस सुनीत कुमार (अध्यक्ष), संजय खरे (न्यायिक सदस्य) और रामेश्वर सिंह (प्रशासनिक सदस्य) की पीठ ने आगे यह भी कहा कि न्यायाधिकरण प्रमोटर द्वारा दायर अपील में प्रतिवादी को ऐसी वैधानिक राहत दे सकता है, भले ही प्रतिवादी ने अलग से अपील दायर न की हो।

न्याधिकरण ने नियामक प्राधिकरण के एक पुराने आदेश में संशोधन किया ताकि आवंटियों को देरी की पूरी अवधि के लिए MCLR + 1% की दर से ब्याज मिल सके, न कि रेरा से पहले के समझौते पर आधारित अलग-अलग दरें।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला नोएडा स्थित ‘एंट्रिक्स गोल्फ व्यू II’ नामक एक आवासीय परियोजना से जुड़ा है, जिसे मेसर्स कलरफुल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड (अपीलकर्ता) द्वारा विकसित किया गया था। प्रतिवादी, मनोज भटनागर और अनीता भटनागर को फरवरी 2011 में एक 3BHK फ्लैट आवंटित किया गया था। आवंटन पत्र के अनुसार, कब्जे की डिलीवरी 30 महीनों के भीतर (6 महीने की अतिरिक्त अवधि के अधीन) की जानी थी, जिससे कब्जे की देय तिथि 13 फरवरी 2014 तय हुई थी।

हालांकि निर्माण कथित तौर पर फरवरी 2014 तक पूरा हो गया था, लेकिन अधिभोग प्रमाण पत्र (OC) केवल 1 दिसंबर 2017 को प्राप्त हुआ था। आखिरकार 21 अक्टूबर 2018 को कब्जा सौंप दिया गया। इस परियोजना को 1 अगस्त 2017 को रेरा के तहत “चल रही परियोजना” (Ongoing Project) के रूप में पंजीकृत किया गया था। नियामक प्राधिकरण ने शुरू में देरी के लिए ब्याज दिया था, लेकिन दरों को दो भागों में विभाजित कर दिया था: रेरा से पहले की अवधि के लिए अनुबंध दर और रेरा के बाद की अवधि के लिए MCLR + 1%। प्रमोटर ने ‘फोर्स मेज्योर’ (Force Majeure) का दावा करते हुए इस आदेश को चुनौती दी थी।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता (प्रमोटर): प्रमोटर ने तर्क दिया कि देरी उनके नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण हुई थी, विशेष रूप से ओखला पक्षी अभयारण्य के पास की परियोजनाओं के संबंध में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के निषेधाज्ञा आदेश और सक्षम प्राधिकारी द्वारा OC/CC देने में देरी। उन्होंने आवंटन पत्र के क्लॉज 39 का हवाला दिया, जो उन्हें सरकारी या अदालती आदेशों के कारण होने वाली देरी के दंड से छूट देता था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आवंटी बिना क्रॉस-अपील दायर किए प्रमोटर की अपील में उच्च ब्याज की मांग नहीं कर सकता।

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प्रतिवादी (आवंटी): आवंटियों ने तर्क दिया कि NGT के आदेशों ने पूरी परियोजना को प्रभावित नहीं किया और प्रमोटर यह साबित करने में विफल रहा कि इस विशिष्ट यूनिट के निर्माण पर कोई रोक थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि OC प्राप्त करने में देरी प्रमोटर द्वारा नियामक आवश्यकताओं के अनुपालन में अपनी चूक के कारण हुई थी। उन्होंने देरी की पूरी अवधि के लिए वैधानिक दर पर ब्याज की मांग की।

न्यायाधिकरण का विश्लेषण

न्याधिकरण ने ‘फोर्स मेज्योर’, धारा 18(1) के तहत वैधानिक ब्याज और प्रतिवादी के पक्ष में आदेशों को संशोधित करने की न्यायाधिकरण की शक्ति के संबंध में तीन प्राथमिक प्रश्न तैयार किए।

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फोर्स मेज्योर पर: न्यायाधिकरण ने प्रमोटर की दलील को खारिज कर दिया, यह देखते हुए कि निर्माण वास्तव में जारी रहा और कथित निषेधाज्ञा अवधि के दौरान पूरा हो गया था। पीठ ने कहा:

“फोर्स मेज्योर के दायरे में आने के लिए, गलती उस पक्ष की लापरवाही नहीं होनी चाहिए जो राहत मांग रहा है… फोर्स मेज्योर क्लॉज एक ब्लैंकेट ओवरराइड के रूप में कार्य नहीं कर सकता है, और इसे विधायी मंशा को कमजोर किए बिना वैधानिक ढांचे के भीतर काम करना चाहिए।”

वैधानिक ब्याज पर: न्यायाधिकरण ने इस बात पर जोर दिया कि अधिनियम की धारा 18(1) बिना शर्त और अनिवार्य है। यह नोट किया गया कि रेरा पूर्वव्यापी (Retroactive) है, जो उन सभी “चल रही परियोजनाओं” पर लागू होता है जहां अधिनियम के लागू होने तक OC प्राप्त नहीं किया गया था।

“समझौते के प्रतिकूल नियम और शर्तें वैधानिक प्रावधान के साथ संघर्ष की सीमा तक लागू नहीं होंगी… समझौते के तहत अनिवार्य ब्याज दर पर वैधानिक प्रावधान प्रभावी होगा।”

आदेशों को संशोधित करने की शक्ति पर: अधिनियम की धारा 44(6) और सीपीसी (CPC) के सिद्धांतों का हवाला देते हुए, न्यायाधिकरण ने कहा कि उसके पास अपीलीय और पुनरीक्षण (Revisional) दोनों शक्तियां हैं। यह देखा गया कि नियामक प्राधिकरण ने ब्याज दरों को विभाजित करने में गलती की थी।

“अलग-अलग अवधियों के लिए ब्याज का विभाजन, यानी आंशिक रूप से अनुबंध दर के अनुसार और आंशिक रूप से वैधानिक दर के अनुसार, विधायी मंशा के खिलाफ प्रतीत होता है… प्रतिवादी आवंटी देरी की पूरी अवधि के लिए MCLR+1 प्रतिशत की दर से ब्याज का हकदार होगा।”

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न्यायाधिकरण ने हाईकोर्ट के लखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम सुषमा शुक्ला के मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें यह पुष्टि की गई थी कि “संविदात्मक शर्तें आवंटियों के पक्ष में अधिनियम द्वारा बनाए गए अनिवार्य वैधानिक दायित्वों/अधिकारों को ओवरराइड नहीं कर सकती हैं।”

निर्णय

न्यायाधिकरण ने अपीलकर्ता-प्रमोटर को कब्जे की मूल देय तिथि (13 फरवरी 2014) से कब्जे की वास्तविक तिथि (21 अक्टूबर 2018) तक प्रतिवादियों को MCLR + 1% की दर से ब्याज का भुगतान करने का निर्देश देते हुए अपील का निपटारा किया। यह भुगतान 45 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए। नियामक प्राधिकरण के आदेश को इस सीमा तक संशोधित किया गया है।

मामले का विवरण:

  • मामले का शीर्षक: मेसर्स कलरफुल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड बनाम मनोज भटनागर और अनीता भटनागर (और प्रतिस्थापित कानूनी उत्तराधिकारी)
  • केस संख्या: अपील संख्या 461 ऑफ 2021
  • पीठ: जस्टिस सुनीत कुमार (अध्यक्ष), संजय खरे (न्यायिक सदस्य), रामेश्वर सिंह (प्रशासनिक सदस्य)
  • दिनांक: 17.04.2026

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