आदिवासी ईसाइयों के दफन अधिकार का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ से जवाब मांगा, आगे किसी भी शव उत्खनन पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस याचिका पर छत्तीसगढ़ सरकार से जवाब तलब किया जिसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य के गांवों में आदिवासी ईसाइयों के शवों को कब्र से निकालकर जबरन दूसरी जगह दफनाया जा रहा है। अदालत ने अंतरिम तौर पर आगे किसी भी प्रकार के शव उत्खनन पर रोक लगा दी है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य को नोटिस जारी किया और कहा कि अगली सुनवाई तक “किसी भी दफनाए गए शव का उत्खनन नहीं किया जाएगा।” मामले को चार सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

छत्तीसगढ़ एसोसिएशन फॉर जस्टिस एंड इक्वालिटी समेत अन्य की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि आदिवासी ईसाइयों को गांव के भीतर स्थित कब्रिस्तानों में अपने मृतकों को दफनाने से रोका जा रहा है और पहले से दफन शवों को भी निकालकर दूरस्थ स्थानों पर पुनः दफन किया जा रहा है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने अदालत को बताया कि एक मामले में याचिकाकर्ता की मां के शव को बिना परिवार की जानकारी के कब्र से निकालकर दूसरी जगह दफनाया गया। एक अन्य मामले में याचिकाकर्ता के पति के शव को कथित रूप से बहुसंख्यक समुदाय के लोगों ने कब्र से निकालकर दूरस्थ स्थान पर दफन कर दिया।

याचिका में कहा गया है कि गांव की सीमाओं के भीतर दफनाने से रोकना, जबकि अन्य समुदायों को ऐसा करने की अनुमति है, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार तथा अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

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याचिकाकर्ताओं ने अदालत से राज्य और निजी व्यक्तियों को दफन क्रिया में हस्तक्षेप करने से रोकने का निर्देश देने की मांग की है। साथ ही यह घोषित करने का अनुरोध किया गया है कि जाति, धर्म या सामाजिक श्रेणी की परवाह किए बिना सभी व्यक्तियों को उसी गांव में दफनाने का अधिकार हो जहां वे रहते हैं।

याचिका में ग्राम पंचायतों को प्रत्येक गांव में सभी समुदायों के लिए कब्रिस्तान हेतु स्थान चिह्नित करने का निर्देश देने तथा जहां संभव हो साझा कब्रिस्तान विकसित कर धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे को बढ़ावा देने की भी मांग की गई है।

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याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य ने मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय ऐसे तत्वों को बढ़ावा दिया है जो धार्मिक आधार पर दफन क्रिया में बाधा डालते हैं, शवों को कब्र से निकालते हैं और परिवारों को डराते हैं।

याचिका में जनवरी 2025 के उस फैसले का भी उल्लेख किया गया है जिसमें एक पादरी के दफन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने विभाजित निर्णय दिया था और अंतिम संस्कार पड़ोसी गांव के ईसाई कब्रिस्तान में करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पुलिस इस आदेश का हवाला देकर उन गांवों में भी दफन से रोक रही है जहां कोई स्थानीय विवाद नहीं है।

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पीठ ने राज्य से जवाब मांगते हुए अंतरिम तौर पर आगे किसी भी शव उत्खनन पर रोक लगा दी है। अब मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी, जिसमें दफन अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और मृतकों की गरिमा से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों पर विचार किया जाएगा।

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