सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि 17 अक्टूबर 1988 के सरकारी प्रस्ताव के तहत स्थायी दर्जा प्राप्त करने वाले दैनिक वेतनभोगी कुशल कर्मचारी 30 जून को सेवानिवृत्त होने के बाद 1 जुलाई को देय वार्षिक वेतन वृद्धि (इनक्रीमेंट) के हकदार हैं। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के उस मौखिक आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें कर्मचारियों को शुरुआत में दैनिक वेतनभोगी होने के आधार पर इस लाभ से वंचित कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह 30 दिनों के भीतर इन कर्मचारियों के पेंशन बकाये का भुगतान सुनिश्चित करे।
विवाद की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ताओं ने गुजरात सरकार के सिंचाई विभाग में 30 वर्षों से अधिक समय तक निरंतर सेवा दी थी और वे विभिन्न वर्षों में 30 जून को सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के ठीक अगले दिन यानी 1 जुलाई को देय वार्षिक वेतन वृद्धि का लाभ देने से प्रशासन ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वे सेवा में नहीं हैं।
इस फैसले के खिलाफ कर्मचारियों ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट के सिंगल जज ने 26 सितंबर 2023 को कर्मचारियों की याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा डायरेक्टर (एडमिनिस्ट्रेशन एंड ह्यूमन रिसोर्सेज), केपीटीसीएल बनाम सी.पी. मुंडिनमनी (2023) मामले में दिए गए फैसले के बाद यह कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है।
सिंगल जज ने प्रवीणभाई खेमाभाई पटेल बनाम गुजरात राज्य मामले का भी उल्लेख किया, जिसे डिवीजन बेंच ने 7 अगस्त 2023 को बरकरार रखा था। अदालत ने रेखांकित किया कि एक वर्ष की निरंतर और संतोषजनक सेवा पूरी करने पर वेतन वृद्धि पाना कर्मचारी का वैध अधिकार है। इसके साथ ही अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे आवेदनों का सत्यापन कर पेंशन को संशोधित करें और बकाये का भुगतान करें। यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया जाता, तो 6 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज देने का भी आदेश दिया गया था।
राज्य सरकार ने सिंगल जज के इस फैसले को एलपीए संख्या 100/2025 के जरिए डिवीजन बेंच में चुनौती दी। डिवीजन बेंच के समक्ष राज्य सरकार ने एक नई दलील पेश की कि ये कर्मचारी मूलतः दैनिक वेतनभोगी थे, इसलिए उन पर सी.पी. मुंडिनमनी फैसले का लाभ लागू नहीं होता। डिवीजन बेंच ने 9 जनवरी 2025 को राज्य की इस दलील को स्वीकार करते हुए सिंगल जज का आदेश रद्द कर दिया, जिसके बाद कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
1988 का सरकारी संकल्प और सरकार की दलील
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सड़क एवं मकान निर्माण विभाग के मंत्री की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों पर जारी 17 अक्टूबर 1988 के सरकारी प्रस्ताव (जीआर) पर विचार किया गया। इस प्रस्ताव के तहत 1 अक्टूबर 1988 तक 10 वर्ष या उससे अधिक की सेवा पूरी करने वाले दैनिक वेतनभोगी कुशल कर्मियों को स्थायी कर्मचारी का दर्जा दिया गया था। इसके तहत उन्हें नियमित पे-स्केल, महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता, स्थानीय प्रतिपूरक भत्ता, ग्रेच्युटी और प्रोविडेंट फंड जैसे सभी सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाने का प्रावधान था। साथ ही उनकी सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष तय की गई थी और उनकी स्थायी सेवा अवधि को पेंशन योग्य माना गया था।
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने भी इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं जताया कि सभी याचिकाकर्ता 1988 के प्रस्ताव के दायरे में आने वाले कुशल कर्मी थे।
राज्य के रुख को खारिज करते हुए जस्टिस संजय कुमार ने कहा:
“यदि ऐसा है, और उन्हें वेतनमान, भत्ते, पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ आदि के प्रयोजन के लिए स्थायी कर्मचारी माना गया था, तो हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष उठाया गया यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वे केवल दैनिक वेतनभोगी होने के कारण वेतन वृद्धि पाने के हकदार नहीं थे।”
अदालत ने आगे टिप्पणी की:
“यह दलील 17.10.1988 के सरकारी प्रस्ताव और उससे मिलने वाले लाभों को पूरी तरह नजरअंदाज करके दी गई प्रतीत होती है। नतीजतन, पीठ के समक्ष दी गई यह दलील भी आधारहीन थी कि इस अदालत का सी.पी. मुंडिनमनी फैसला उन पर लागू नहीं होता।”
सेवानिवृत्ति के बाद वेतन वृद्धि का कानूनी ढांचा
सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि सी.पी. मुंडिनमनी के सिद्धांत को बाद में यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एम. सिद्धराज (2023) मामले में भी अपनाया गया था। इसके बाद दायर विविध आवेदनों में सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर 2024 को अंतरिम निर्देश जारी किए थे, जिन्हें 20 फरवरी 2025 के आदेश के तहत संशोधित और अंतिम रूप दिया गया।
20 फरवरी 2025 के संशोधित ढांचे के अनुसार:
- जिन तीसरे पक्षों ने अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया था, उनके लिए यह निर्णय 1 मई 2023 से प्रभावी माना गया और पूर्व अवधि का कोई बकाया देय नहीं था।
- जिन कर्मचारियों ने रिट याचिका दायर कर सफलता प्राप्त की थी, उनके मामलों में यह निर्णय पूर्व-न्याय (रेस ज्यूडिकाटा) के रूप में प्रभावी रहेगा, बशर्ते फैसला अंतिम हो चुका हो।
- जिन कर्मचारियों ने एम. सिद्धराज फैसले से पहले प्रशासनिक अधिकरणों, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं, उनके लिए संशोधित खंड (डी) लागू होगा:
“यदि किसी सेवानिवृत्त कर्मचारी ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण/हाईकोर्ट/इस न्यायालय के समक्ष हस्तक्षेप/पक्षकार बनने/रिट याचिका/मूल आवेदन दायर किया है, तो एक वेतन वृद्धि जोड़कर बढ़ी हुई पेंशन उस माह से तीन वर्ष पूर्व की अवधि के लिए देय होगी, जिस माह में ऐसा आवेदन या याचिका दायर की गई थी।”
अदालत ने मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड बनाम विद्युत मंडल पेंशन समाज (2025) के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें यह तय किया गया था कि पेंशन बकाये पर कोई ब्याज देय नहीं होगा, लेकिन अधिकारियों के लिए अदालत द्वारा तय समयसीमा के भीतर भुगतान करना अनिवार्य है। समय पर भुगतान न करने की स्थिति में डिफॉल्ट ब्याज देना होगा।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश
पीठ ने पाया कि अपीलकर्ताओं ने वर्ष 2022 में ही हाईकोर्ट में अपनी रिट याचिका दायर कर दी थी। इसलिए वे 20 फरवरी 2025 के संशोधित खंड (डी) के दायरे में आते हैं। इसके तहत वे याचिका दायर करने के माह से ठीक तीन वर्ष पूर्व की अवधि के लिए एक वेतन वृद्धि जोड़कर संशोधित पेंशन और बकाये के हकदार हैं।
अदालत ने यह राहत उन प्रफॉर्म प्रतिवादियों को भी प्रदान की, जो मूल रिट याचिका में सह-याचिकाकर्ता थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट में अपील में शामिल नहीं हो पाए थे।
अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे प्रत्येक कर्मचारी की सेवानिवृत्ति की तारीख की जांच करें, 20 फरवरी 2025 के आदेश के संशोधित खंड (डी) के तहत देय राशि की गणना करें और आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर पूरी राशि का भुगतान करें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि 30 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो बकाये पर डिफॉल्ट की तारीख से वास्तविक भुगतान होने तक 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज देय होगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: छगनभाई कोह्याभाई पटेलिया और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल)
संख्या 26129/2025 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा
निर्णय की तिथि: 6 अक्टूबर 2026

