आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिसकर्मियों को जमीन, मकान और अन्य निजी संपत्ति से जुड़े दीवानी (सिविल) मामलों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से रोक दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल मामलों का निपटारा करना केवल न्यायपालिका का संवैधानिक कार्य है। पुलिस के पास नागरिकों के निजी अधिकारों को तय करने या उन पर समझौते के लिए दबाव डालने का कोई कानूनी अधिकार क्षेत्र नहीं है।
छह याचिकाओं के एक समूह पर साझा फैसला सुनाते हुए जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम ने कहा कि जब कोई मामला सक्षम न्यायिक या अर्ध-न्यायिक मंच के विचाराधीन हो, तो कार्यकारी एजेंसियां उस संस्था की जगह खुद फैसले नहीं ले सकतीं। अदालत ने जोर देकर कहा कि बिना अधिकार क्षेत्र के ऐसे मामलों में पुलिस का दखल पूरी तरह से गैरकानूनी और असंवैधानिक है।
याचिकाकर्ताओं ने लगाए थाने बुलाने और समझौते का दबाव बनाने के आरोप
यह आदेश छह अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सामने आया, जिनमें मकान और जमीन से जुड़े विवादों में पुलिसिया दखलंदाजी के गंभीर आरोप लगाए गए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि पुलिस अधिकारी उन्हें बार-बार थानों में बुलाते थे और अदालतों में पहले से लंबित मामलों में जबरन समझौता करने का दबाव डालते थे।
अदालत के सामने रखी गई शिकायतों में यह आरोप भी शामिल था कि एक पुलिस अधिकारी ने याचिकाकर्ता के मकान पर ताला लगा दिया और उसे घर में घुसने से रोक दिया। एक अन्य मामले में कब्जा खाली करने के लिए दबाव बनाने, जबकि एक याचिकाकर्ता को दीवानी मुकदमा वापस लेने की धमकी देने का आरोप था। वहीं एक पीड़ित ने आरोप लगाया कि संपत्ति विवाद में समझौता कराने के लिए उसे कई घंटों तक थाने में बैठाकर रखा गया।
राज्य सरकार ने इन सभी आरोपों का खंडन किया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि पुलिस ने याचिकाकर्ताओं को थानों में नहीं बुलाया था और जब तक किसी संज्ञेय अपराध का मामला दर्ज नहीं होता, पुलिस सिविल विवादों में कोई हस्तक्षेप नहीं करती है।
औपनिवेशिक व्यवस्था से लोकतांत्रिक पुलिसिंग की ओर बढ़ने की जरूरत
पुलिस व्यवस्था की पृष्ठभूमि पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस कुंचेम ने कहा कि देश का पुलिस तंत्र आज भी औपनिवेशिक विरासत को ढो रहा है। विख्यात कानूनी विद्वान उपेंद्र बक्शी की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि औपनिवेशिक पुलिस व्यवस्था स्वतंत्रता के बाद भी बची रही, उसने केवल अपने आका बदले हैं। अदालत ने कहा कि देश में चुनी हुई सरकार आने के बावजूद पुलिस का बुनियादी संस्थागत ढांचा काफी हद तक 1861 के पुलिस अधिनियम पर ही टिका रहा।
हाईकोर्ट ने कहा कि 19वीं सदी का यह कानून नागरिकों की सेवा के उद्देश्य से नहीं, बल्कि आबादी को नियंत्रित करने, व्यवस्था बनाए रखने और तत्कालीन शासकों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया था। अदालत ने सभी पक्षों से पुलिस व्यवस्था को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकालकर लोकतांत्रिक और जन-केंद्रित बनाने की अपील की। पीठ ने कहा कि पुलिस नागरिकों पर निरंकुश अधिकार चलाने वाली शासक नहीं, बल्कि संवैधानिक उसूलों की रक्षक है और उसे अपनी शक्तियां कानून के दायरे में रहकर निष्पक्षता तथा आनुपातिकता के साथ इस्तेमाल करनी चाहिए।
पुलिस बल की कमी और डीजीपी के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन
हाईकोर्ट ने आंध्र प्रदेश में पुलिसकर्मियों की भारी कमी का भी उल्लेख किया। अदालत ने दर्ज किया कि राज्य में प्रति एक लाख आबादी पर केवल 166.18 पुलिसकर्मी हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र का मानक प्रति लाख 222 पुलिसकर्मियों का है। जस्टिस कुंचेम ने कहा कि पहले से ही सीमित संसाधनों से जूझ रहे पुलिस बल को उन मामलों में झोंकना निरर्थक है जो उसके अधिकार क्षेत्र में ही नहीं आते। इससे कुछ पुलिसकर्मियों के अनुचित लाभ कमाने की गुंजाइश बनती है, जो असंवैधानिक और कानून के खिलाफ है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शांति बनाए रखने, अपराध की रोकथाम, जान-माल की रक्षा करने और सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका पर कानूनी निवारक कदम उठाने का पुलिस का कर्तव्य पहले की तरह बना रहेगा। साथ ही यदि धोखाधड़ी, जालसाजी, मारपीट, आपराधिक साजिश या आपराधिक अतिचार जैसे संज्ञेय अपराध सामने आते हैं, तो पुलिस को नियमानुसार कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है।
हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस को 24 अक्टूबर 2025 को आंध्र प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया, जिसमें अधिकारियों को जमीन या मालिकाना हक के मामलों में किसी का भी पक्ष लेने से साफ तौर पर मना किया गया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने बिना किसी खर्च के याचिकाओं का निस्तारण कर दिया, सभी लंबित अंतरिम अर्जियां बंद कर दीं और पक्षकारों को सक्षम सिविल अदालतों में राहत की मांग करने की छूट दी।

