तेलंगाना सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा: मुख्यमंत्री या मंत्रियों से जुड़े मामलों को छोड़कर राज्यपाल मंत्रीपरिषद की सलाह से बंधे

कांग्रेस शासित तेलंगाना सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राज्यपाल सामान्य परिस्थितियों में मंत्रीपरिषद की सहायता और सलाह से बंधे होते हैं, यहां तक कि अभियोजन की अनुमति देने जैसे मामलों में भी। अपवाद केवल वही होगा जब किसी मुख्यमंत्री या मंत्री पर व्यक्तिगत रूप से आपराधिक मामले में आरोप हो।

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ अनुच्छेद 143(1) के तहत आए राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुनवाई कर रही है। इसमें यह सवाल शामिल है कि क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक प्राधिकारी राज्यों की विधानसभाओं से पारित विधेयकों पर निर्णय अनिश्चित काल तक लंबित रख सकते हैं और क्या अदालतें इन निर्णयों के लिए बाध्यकारी समयसीमा तय कर सकती हैं।

तेलंगाना सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निरंजन रेड्डी ने दलील दी कि अदालत को राज्यपालों की “निहित पक्षपातपूर्ण प्रवृत्ति” पर भी विचार करना चाहिए, क्योंकि कुछ राज्यों में राज्यपाल विधेयकों पर सहमति रोककर बैठे रहते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तमिलनाडु में राज्यपाल ने वह विधेयक लंबित रखा था, जिसमें राज्यपाल को राज्य विश्वविद्यालयों का कुलपति पद से हटाने का प्रावधान था।

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रेड्डी ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 200 का दूसरा प्रावधान स्पष्ट करता है कि सामान्य परिस्थितियों में राज्यपाल के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है और वे मंत्रीपरिषद की सलाह से ही बंधे हैं। अनुच्छेद 200 राज्यपाल को विधेयक पर सहमति देने, अस्वीकार करने, पुनर्विचार के लिए लौटाने या राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने का अधिकार देता है।

पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा औरन्यायमूर्ति  ए.एस. चंदुरकर भी शामिल हैं। यह सुनवाई विपक्ष शासित राज्यों की ओर से रखी गई दलीलों पर केंद्रित है, जो राष्ट्रपति संदर्भ का विरोध कर रहे हैं। यह संदर्भ सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के तमिलनाडु राज्यपाल मामले के फैसले से उत्पन्न हुआ है।

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मंगलवार को अदालत ने कहा था कि राज्यपालों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे “उचित समय” में कार्रवाई करें, भले ही अनुच्छेद 200 में “यथाशीघ्र” शब्द का स्पष्ट उल्लेख न हो।

पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर अनुच्छेद 200 में “यथाशीघ्र” शब्द डाला था, और अदालत तीन महीने जैसी समयसीमा तय करने का अधिकार रखती है।

पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल, केरल सरकार की ओर से पेश होते हुए, पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की उस प्रथा का हवाला दिया जिसमें वे निर्णय लेने से पहले संबंधित मंत्रालयों से ब्रीफिंग लेते थे।

कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार ने भी कहा कि संवैधानिक ढांचे के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों “औपचारिक प्रमुख” हैं और उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करना होता है।

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राष्ट्रपति संदर्भ में अदालत के सामने 14 अहम सवाल रखे गए हैं, जिनमें यह भी शामिल है कि क्या राज्यपाल अनिश्चित काल तक सहमति रोके रख सकते हैं और क्या न्यायपालिका राष्ट्रपति या राज्यपाल को राज्य विधेयकों पर निर्णय के लिए समयसीमा तय करने के लिए बाध्य कर सकती है।

सुनवाई जारी है और विपक्ष शासित राज्यों की दलीलें दिन में आगे भी जारी रहने की उम्मीद है।

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