‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के ज्ञान को सुप्रीम कोर्ट में जगह नहीं: धार्मिक स्वतंत्रता मामले में कोर्ट की तीखी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि अदालती कार्यवाही केवल ठोस कानूनी मानकों और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि सोशल मीडिया पर चलने वाली अनौपचारिक चर्चाओं पर। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चुटकी लेते हुए कहा कि वह ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ से मिली जानकारी को स्वीकार नहीं कर सकता।

यह टिप्पणी नौ जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।

सुनवाई के दौरान दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया। यह लेख धार्मिक राहत के मामलों में न्यायिक संयम बरतने की बात करता था।

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इस पर चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने न्यायिक सिद्धांतों और व्यक्तिगत विचारों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा, “हम सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों और न्यायविदों का सम्मान करते हैं, लेकिन व्यक्तिगत राय केवल व्यक्तिगत राय ही होती है।”

हालांकि वकील कौल ने तर्क दिया कि भारतीय सभ्यता इतनी समृद्ध है कि हमें किसी भी स्रोत या देश से मिलने वाले ज्ञान और बुद्धिमत्ता का स्वागत करना चाहिए। इसी बीच, जस्टिस बी वी नागरथ्ना ने मजाकिया लहजे में कहा, “लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से नहीं।” ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली असत्यापित या भ्रामक खबरों के लिए किया जाता है। कौल ने जवाब में कहा कि वह इस बहस में नहीं पड़ना चाहते कि कौन सी यूनिवर्सिटी अच्छी है या बुरी, बल्कि उनका मुद्दा सिर्फ यह है कि ज्ञान जहां से भी मिले उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।

नौ जजों की यह पीठ फिलहाल इस जटिल सवाल पर विचार कर रही है कि विभिन्न धर्मों की “अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं” (essential religious practices) को कैसे परिभाषित किया जाए। बुधवार को कोर्ट ने स्वीकार किया था कि किसी धार्मिक संप्रदाय की किसी विशेष प्रथा को अनिवार्य या गैर-अनिवार्य घोषित करने के लिए मानक तय करना बेहद कठिन, बल्कि लगभग असंभव कार्य है।

यह पूरी सुनवाई सितंबर 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले के बाद हो रही है, जिसमें पांच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। उस समय कोर्ट ने सदियों पुरानी इस प्रथा को अवैध और असंवैधानिक बताया था।

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फिलहाल संविधान पीठ इस मामले में संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन की बारीकी से जांच कर रही है।

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