चेक बाउंस मामला दोषसिद्धि के बाद भी पक्षकारों के बीच समझौता होने पर किया जा सकता है कंपाउंड – पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत चेक बाउंस का अपराध मुकदमेबाजी के किसी भी चरण में कंपाउंड (शमन) किया जा सकता है, भले ही निचली अदालत से दोषसिद्धि हो चुकी हो। कोर्ट ने पक्षों के बीच हुए समझौते को स्वीकार करते हुए न केवल अभियुक्त की सजा रद्द की, बल्कि 15 साल लंबी कानूनी लड़ाई को देखते हुए उन पर लगने वाला कंपाउंडिंग शुल्क (costs) भी माफ कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMIC), फरीदाबाद द्वारा वर्ष 2017 में सुनाए गए फैसले से संबंधित है। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने याचिकाकर्ता वी.के. सिंह को चेक बाउंस का दोषी पाते हुए दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी और शिकायतकर्ता ‘श्री नाथ एंटरप्राइजेज’ को ₹20,60,002 का मुआवजा देने का आदेश दिया था।

सत्र न्यायालय ने पैरवी के अभाव में याचिकाकर्ता की अपील खारिज कर दी थी, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (revision petition) दायर कर न्याय की गुहार लगाई थी।

पक्षों के तर्क

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि विवाद का पूरी तरह निपटारा हो चुका है और याचिकाकर्ता ने मुआवजे की पूरी राशि शिकायतकर्ता को भुगतान कर दी है। फरीदाबाद की निचली अदालत ने भी 11 दिसंबर 2024 को इस समझौते की पुष्टि की थी।

शिकायतकर्ता के वकील ने भी अदालत को अवगत कराया कि उन्हें पूरी राशि प्राप्त हो चुकी है और समझौता होने के बाद उन्हें याचिकाकर्ता को बरी किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

READ ALSO  यदि स्वामित्व साबित नहीं और संपत्ति की पहचान संदिग्ध, तो नहीं मिल सकती स्थाई निषेधाज्ञा: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

जस्टिस सुमीत गोयल ने मामले की सुनवाई करते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 359 (पुरानी Cr.P.C. की धारा 320) और नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 147 के प्रावधानों का विस्तार से उल्लेख किया।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘दामोदर एस. प्रभु बनाम सैयद बाबालाल एच. (2010)’ और ‘संजबीज तारी बनाम किशोर एस. बोरकर (2025)’ के निर्णयों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि चेक बाउंस के मामलों में ‘दंडात्मक’ पहलू के बजाय ‘क्षतिपूर्ति’ (compensatory) पहलू को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

दोषसिद्धि के बाद समझौते की कानूनी स्थिति पर कोर्ट की टिप्पणी:

“नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध को मुकदमेबाजी के हर स्तर पर कंपाउंड किया जा सकता है, तब भी जब मामला मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायालय द्वारा तय किए जाने के बाद हाईकोर्ट पहुंच चुका हो। दूसरे शब्दों में, यदि पक्ष आपस में समझौता कर लेते हैं, तो अभियुक्त को दोषसिद्धि और अपील खारिज होने के बाद भी बरी किया जा सकता है।”

शुल्क माफी पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि समझौते पर शुल्क लगाना सामान्य नियम है, लेकिन असाधारण परिस्थितियों में इसे माफ किया जा सकता है। जस्टिस गोयल ने हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों (Section 528 BNSS) का उल्लेख करते हुए कहा कि ये शक्तियां अदालत के लिए “प्राणवायु” के समान हैं, जिनका उद्देश्य कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना है।

अदालत का फैसला

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2011 से ही इस कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहा है। ऐसे में कोर्ट ने इसे एक विशेष परिस्थिति मानते हुए उन पर कोई कंपाउंडिंग शुल्क नहीं लगाया। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा दी गई सजा और सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को आरोपों से बरी कर दिया।

READ ALSO  2027 जनगणना में जातीय आंकड़ों के रिकॉर्डिंग और सत्यापन प्रक्रिया पर दायर याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की, केंद्र से सुझावों पर विचार करने को कहा

केस विवरण:

  • केस टाइटल: वी.के. सिंह और अन्य बनाम श्री नाथ एंटरप्राइजेज और अन्य
  • केस नंबर: CRR-179-2018 (O&M)
  • बेंच: जस्टिस सुमीत गोयल
  • दिनांक: 21 अप्रैल, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles