सम्मान से जीने के अधिकार में आवारा कुत्तों के खतरे से मुक्ति भी शामिल: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; ट्रांसफर और नसबंदी के आदेशों को वापस लेने से इनकार

एक बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक और प्रशासनिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि गरिमापूर्ण जीवन जीने (सम्मान से जीने) के अधिकार में आवारा कुत्तों के हमले या काटने के डर के बिना सुरक्षित रहने का अधिकार भी शामिल है।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने आवारा कुत्तों के विस्थापन (relocation) और नसबंदी (sterilisation) से जुड़े पिछले आदेशों को वापस लेने या उनमें बदलाव करने की मांग करने वाली सभी याचिकाओं और आवेदनों को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) द्वारा जारी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को भी खारिज कर दिया और राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए सख्त निर्देश जारी किए।

क्या है पूरा मामला?

इस मामले की शुरुआत पिछले साल 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए एक स्वतः संज्ञान (suo motu) से हुई थी। कोर्ट ने राजधानी दिल्ली में आवारा कुत्तों के काटने और इसके कारण फैल रहे रेबीज, विशेष रूप से बच्चों में, की मीडिया रिपोर्टों पर संज्ञान लिया था।

इसके बाद, 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा आदेश जारी किया था। कोर्ट ने अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक व संस्थागत क्षेत्रों में कुत्तों के काटने की घटनाओं में “चिंताजनक वृद्धि” पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि इन संवेदनशील क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को तुरंत हटाकर उचित नसबंदी और टीकाकरण के बाद निर्धारित शेल्टर होम में भेजा जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि पकड़े गए कुत्तों को वापस उन्हीं जगहों पर न छोड़ा जाए। इसके अतिरिक्त, राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों तथा एक्सप्रेस-वे से मवेशियों और अन्य आवारा जानवरों को पूरी तरह हटाने के निर्देश भी दिए गए थे।

इस आदेश के बाद कई पक्षों ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर कर 7 नवंबर के निर्देशों में बदलाव या उन्हें वापस लेने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 29 जनवरी को इन सभी याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान पीठ ने पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों द्वारा आदेशों के पालन में ढिलाई पर कड़ी नाराजगी जताई थी।

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अदालत की सख्त टिप्पणियां

मंगलवार को फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने नागरिकों की सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन पर जोर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आवारा पशुओं के नियंत्रण में सरकार की विफलता सीधे तौर पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है।

पीठ ने अपने फैसले में कहा, “सम्मान के साथ जीने के अधिकार में आवारा कुत्तों के काटने या नुकसान पहुंचने के भय के बिना स्वतंत्र रूप से रहने का अधिकार शामिल है।” अदालत ने जमीनी हकीकतों का हवाला देते हुए कहा कि वह “उन कड़वी जमीनी सच्चाइयों से मुंह नहीं मोड़ सकती, जहां बच्चे, बुजुर्ग और विदेशी पर्यटक आए दिन डॉग बाइट (कुत्तों के काटने) का शिकार बन रहे हैं।”

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अदालत ने स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकारों की कार्यप्रणाली पर भी कड़े सवाल उठाए। कोर्ट ने पाया कि आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी से निपटने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से ठोस, व्यवस्थित और निरंतर प्रयासों की “साफ कमी” दिखती है। कोर्ट ने कहा कि देश भर में ‘एनिमल बर्थ कंट्रोल’ (ABC) नीति का क्रियान्वयन काफी हद तक बिखरा हुआ, कम बजट वाला और असमान रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और फैसला

अपने पुराने रुख पर कायम रहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर के आदेश को बदलने की सभी मांगें ठुकरा दी हैं। इसके साथ ही, AWBI की गाइडलाइंस को पूरी तरह वैध माना गया है।

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देश में बुनियादी ढांचे की भारी कमी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और वैधानिक निकायों को निर्देश दिया है कि वे आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए आपसी समन्वय के साथ काम करें। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि इस खतरे को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे (infrastructure) और शेल्टर होम की व्यवस्थाओं को तत्काल दुरुस्त और मजबूत किया जाए।

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