सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को एक निजी डिस्टिलरी के लिए एथेनॉल आपूर्ति का कोटा बढ़ाने पर विचार करने को कहा गया था। अदालत ने भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह कदम उठाया।
जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की पीठ ने बीपीसीएल की इस याचिका पर औपचारिक नोटिस जारी किया है। बीपीसीएल ने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत बीपीसीएल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) को निर्देश दिया गया था कि वे एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2025-26 के लिए वीआईएनपी (VINP) डिस्टिलरीज एंड शुगर्स की ओर से कोटा बढ़ाने के आवेदन पर विचार करें।
राष्ट्रीय ब्लेंडिंग नीति के प्रभावित होने की आशंका
मामले की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने दलील दी कि किसी एक आपूर्तिकर्ता के पक्ष में कोटा बदलने से देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की राष्ट्रीय नीति पर विपरीत असर पड़ेगा। उन्होंने अदालत को बताया कि एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2025-26 के लिए आवंटन प्रक्रिया 17 अक्टूबर 2025 को ही पूरी हो चुकी है।
इस प्रक्रिया के तहत कुल 378 आपूर्तिकर्ताओं के साथ 1,050 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति के अनुबंध तय किए जा चुके हैं। इस तय मात्रा में से लगभग 680 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति इन कंपनियों द्वारा 18 जून तक तेल विपणन कंपनियों को की जा चुकी है।
बीपीसीएल ने अपनी याचिका में यह भी तर्क दिया कि वीआईएनपी डिस्टिलरीज अपनी स्थापित उत्पादन क्षमता के आधार पर एथेनॉल आपूर्ति का पूर्ण अधिकार होने का दावा नहीं कर सकती, क्योंकि इससे पहले से तय अन्य आपूर्तिकर्ताओं के हितों को नुकसान पहुंचेगा।
मुकदमों की बाढ़ आने की चेतावनी
अटॉर्नी जनरल ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि किसी एक कंपनी का कोटा बढ़ाया गया, तो उसी स्थिति में मौजूद अन्य आपूर्तिकर्ता भी समानता के आधार पर अपने कोटे में बढ़ोतरी की मांग करने लगेंगे। इससे अदालतों में मुकदमों की बाढ़ आ सकती है और पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इससे पहले, कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सरकारी नीति के तहत स्थापित और तेल कंपनियों को ही विशेष रूप से आपूर्ति करने के लिए बाध्य समर्पित एथेनॉल संयंत्रों को दीर्घकालिक समझौतों (एलटीओए) के तहत मिलने वाले प्राथमिकता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
सरकार ने जारी किया स्पष्टीकरण
कोर्ट की कार्यवाही के बाद अटॉर्नी जनरल के कार्यालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर मीडिया के उन दावों का खंडन किया, जिनमें 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) कार्यक्रम को एक “प्रायोगिक परियोजना” बताया गया था। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह सक्रिय और बेहद महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम है।
विज्ञप्ति में यह जानकारी भी दी गई है कि विभिन्न क्षेत्रीय हाईकोर्ट में लंबित इसी तरह के मामलों को एक साथ जोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर याचिकाएं दायर की जा रही हैं। सरकार का उद्देश्य इन सभी मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कराना है ताकि अलग-अलग अदालतों से परस्पर विरोधी फैसलों की आशंका को टाला जा सके और देश भर में एथेनॉल की निर्बाध आपूर्ति बनी रहे।

