सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में तैनात एक न्यायिक अधिकारी (जज) को तत्काल सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया है, जिन्हें साल 2008 में उनके अपहरण के मामले में सजा काट रहे दोषियों से जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। याचिकाकर्ता, जिनका उस समय नाबालिग रहते हुए अपहरण किया गया था, ने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की तीन जजों वाली बेंच ने कहा कि दोषियों की आपराधिक पृष्ठभूमि को देखते हुए इस मामले में राज्य का हस्तक्षेप और सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए, बेंच ने दिल्ली पुलिस को याचिकाकर्ता के खतरे के स्तर (threat perception) का आकलन करने और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। यह सुरक्षा केवल याचिकाकर्ता तक ही सीमित नहीं है; कोर्ट ने गुजरात पुलिस को भी याचिकाकर्ता के भाई की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश दिया है, जो वहां एक न्यायिक अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।
इसके अतिरिक्त, बेंच ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र के अधिकारियों को भी यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे वहां रह रहे याचिकाकर्ता के परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें और यह सुनिश्चित करें कि उन्हें कोई नुकसान न पहुंचे।
याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि संबंधित हाईकोर्ट की अनुमति के बिना इन दोषियों को कोई पैरोल या छूट (remission) नहीं दी जाएगी।
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में दोषियों द्वारा दायर रिहाई की याचिका का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि हाईकोर्ट से उन्हें कोई राहत मिलती भी है, तो उस आदेश को दो सप्ताह तक प्रभावी नहीं माना जाएगा। यह समय याचिकाकर्ता को उनकी रिहाई के खिलाफ कानूनी कदम उठाने के लिए दिया गया है।
यह मामला साल 2008 का है जब याचिकाकर्ता का अपहरण कर लिया गया था। इस मामले में शामिल आरोपियों को बाद में दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई। हालांकि, याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि जेल के भीतर से या अपने सहयोगियों के माध्यम से ये दोषी लगातार धमकियां दे रहे हैं।
बेंच ने संज्ञान लिया कि ये दोषी “आदतन अपराधी” हैं और कई अन्य आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने कहा, “दोषियों और उनके सहयोगियों के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए, हमें लगता है कि याचिकाकर्ता और उनके परिवार के सदस्यों की सुरक्षा के लिए कुछ आवश्यक निर्देश जारी करना जरूरी है।”
इससे पहले दिसंबर में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर चिंता जताई थी और कहा था कि मामले पर विचार होने तक दोषियों को कोई छूट नहीं दी जाएगी।

