पत्नी के बयानों के आधार पर ‘दहेज देने’ के लिए उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी और परिवार के खिलाफ FIR दर्ज करने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई पति केवल अपनी पत्नी या उसके परिवार द्वारा जांच के दौरान दिए गए बयानों के आधार पर उनके खिलाफ “दहेज देने” के लिए FIR दर्ज करने की मांग नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा 7(3) ‘व्यथित व्यक्ति’ (Aggrieved Person) को वैधानिक सुरक्षा प्रदान करती है, ताकि दहेज लेने वाले के खिलाफ दिए गए उनके बयानों का इस्तेमाल उन्हीं के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए न किया जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद राहुल गुप्ता (याचिकाकर्ता) और राधिका गुप्ता (प्रतिवादी संख्या 7) के बीच वैवाहिक कलह से उत्पन्न हुआ था। इनका विवाह 24 नवंबर, 2007 को हुआ था। संबंधों में खटास आने के बाद, पत्नी ने महिला थाना, अंबिकापुर में पति और उसके परिवार के खिलाफ IPC की धारा 498A और दहेज प्रतिषेध अधिनियम (DP Act) की धारा 3 के तहत FIR संख्या 03/2023 दर्ज कराई थी।

जांच के दौरान, CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज बयानों में पत्नी और उसके परिवार ने शादी से पहले दहेज देने की बात स्वीकार की थी। इन्हीं बयानों को आधार बनाकर पति ने 25 दिसंबर, 2023 को एक शिकायत दर्ज कराई और मांग की कि दहेज देने के अपराध में पत्नी के परिवार पर धारा 3 के तहत अलग से FIR दर्ज की जाए। न्यायिक मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायालय और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कानूनी मुद्दे

अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या पत्नी और उसके परिवार के वे बयान, जिनमें उन्होंने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराते समय दहेज देने की बात स्वीकार की है, उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का एकमात्र आधार बन सकते हैं।

कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दहेज प्रतिषेध अधिनियम के विधायी उद्देश्य का विश्लेषण किया। कोर्ट ने उल्लेख किया कि मूल रूप से धारा 3 दहेज देने और लेने, दोनों को समान रूप से दंडित करती थी। हालांकि, 1982 की संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट के बाद महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। समिति ने पाया था कि दहेज देने वाले अक्सर “अपराधी के बजाय पीड़ित” होते हैं और सामाजिक मानदंडों के कारण ऐसा करने के लिए मजबूर होते हैं।

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पीठ ने दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 7(3) को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा:

“किसी भी कानून में कुछ भी होने के बावजूद, अपराध से व्यथित व्यक्ति द्वारा दिए गए बयान के कारण उस व्यक्ति पर इस अधिनियम के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाएगा।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“अनिवार्य रूप से, धारा 7(3) यह प्रावधान करती है कि पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों, जो कि व्यथित व्यक्ति हैं, द्वारा दहेज ‘लेने’ के संबंध में दिए गए बयान… उनके खिलाफ धारा 3 के तहत ‘दहेज देने’ के अपराध के लिए मुकदमा चलाने का आधार नहीं बन सकते।”

कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2007 के नीरा सिंह बनाम राज्य मामले का भी जिक्र किया, जिसका याचिकाकर्ता ने हवाला दिया था। पीठ ने नीरा सिंह मामले की टिप्पणियों को “भूल” और “ओबिटर डिक्टा” (प्रासंगिक न होने वाली टिप्पणी) करार दिया और कहा कि वह फैसला धारा 7(3) की अनदेखी कर दिया गया था।

दूसरी FIR दर्ज करने की संभावना पर कोर्ट ने उपकार सिंह बनाम वेद प्रकाश और राजस्थान राज्य बनाम सुरेंद्र सिंह राठौर का संदर्भ देते हुए स्वीकार किया कि यदि स्वतंत्र साक्ष्य मौजूद हों तो जवाबी शिकायत दर्ज की जा सकती है। हालांकि, वर्तमान मामले में कोर्ट ने कहा:

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“यदि किसी मामले में ‘दहेज देने’ के अपराध को स्थापित करने के लिए केवल पत्नी और उसके परिवार के बयानों को ही आधार बनाया जाता है, तो इसका अर्थ यह होगा कि वे ‘व्यथित व्यक्ति’ होने के नाते धारा 7(3) के सुरक्षा कवच के दायरे में आते हैं और उनके आधार पर उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों में कोई दम न पाते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि याचिकाकर्ता का पूरा मामला केवल पत्नी की शिकायत और धारा 161 के तहत दर्ज बयानों पर आधारित था, इसलिए उन्हें वैधानिक संरक्षण प्राप्त है।

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कोर्ट ने एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) श्री धनंजय मिश्रा द्वारा प्रदान की गई बहुमूल्य सहायता के लिए आभार भी व्यक्त किया।

मामले का विवरण:

  • मामले का शीर्षक: राहुल गुप्ता बनाम स्टेशन हाउस ऑफिसर और अन्य
  • केस नंबर: स्पेशल लीव पिटीशन (Crl.) नंबर 13755/2025
  • पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
  • दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

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