धारा 156(3) CrPC आवेदन खारिज होने से बाद की FIR पर रोक नहीं लगती, यह रेस जुडीकाटा के रूप में कार्य नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 156(3) के तहत दायर आवेदन के खारिज होने से पूर्व न्याय (रेस जुडीकाटा) का सिद्धांत लागू नहीं होता है और यह संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाली जानकारी के आधार पर धारा 154 CrPC के तहत पुलिस को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से नहीं रोकता है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसने अपीलकर्ता प्रमोद कुमार शुक्ला के खिलाफ नौकरी में धोखाधड़ी के कथित मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

24 दिसंबर 2024 को शिकायतकर्ता ने यह आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई कि अपीलकर्ता प्रमोद कुमार शुक्ला ने यह दावा किया था कि शिक्षा निदेशालय, प्रयागराज में उसका प्रभाव है और वह ₹20,00,000 की राशि के बदले शिकायतकर्ता के बेटे अखिलेश प्रताप सिंह और पोते कौशिक प्रताप सिंह को क्लर्क के पद पर नियुक्ति दिला सकता है। अपीलकर्ता और उसके पिता के आश्वासनों पर भरोसा करते हुए शिकायतकर्ता ने अपीलकर्ता के बैंक खाते में 12 जनवरी 2023 को ₹50,000, 13 जनवरी 2023 को ₹25,000, 16 जनवरी 2023 को ₹50,000 और 17 जनवरी 2023 को ₹50,000 ट्रांसफर कर दिए।

कथित नियुक्तियों के लिए कोई साक्षात्कार आयोजित नहीं किया गया। 19 मई 2024 को जब शिकायतकर्ता ने प्राची अस्पताल, शांतिपुरम, प्रयागराज के पास अपीलकर्ता से जवाब मांगा, तो अपीलकर्ता ने कथित तौर पर उसके साथ गाली-गलौज की, जान से मारने की धमकी दी और पैसे वापस मांगने पर झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी। शिकायतकर्ता ने उसी दिन थाना प्रभारी, फाफामऊ, प्रयागराज को सूचित किया और बैंक विवरण तथा अपीलकर्ता द्वारा प्रदान किए गए कथित परीक्षा परिणाम की फोटोकॉपी प्रस्तुत की। इसके परिणामस्वरूप, अपीलकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 406, 419, 420, 467, 468, 471, 504 और 506 के तहत एफआईआर संख्या 405/2024 दर्ज की गई।

इस एफआईआर से पहले शिकायतकर्ता ने अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज के समक्ष धारा 156(3) CrPC के तहत एक आवेदन दायर किया था। मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट मांगी, जिसमें दर्शाया गया कि विवाद भूमि सौदे से संबंधित है। यह देखते हुए कि शिकायतकर्ता का बयान पुलिस रिपोर्ट के विपरीत था, मजिस्ट्रेट ने 11 सितंबर 2024 को आवेदन खारिज कर दिया, जिसे बाद में सत्र अदालत ने पुनरीक्षण (रिवीजन) में बरकरार रखा।

इसके बाद अपीलकर्ता ने एफआईआर संख्या 405/2024 को रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 5 जून 2025 को हाईकोर्ट ने यह मानते हुए रिट याचिका खारिज कर दी कि धारा 156(3) के आवेदन की अस्वीकृति बाद में एफआईआर दर्ज करने में बाधा नहीं बनती यदि दी गई जानकारी से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता हो। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि दोनों पक्ष संपत्ति के कारोबारी थे और उनके बीच नागरिक प्रकृति का भूमि विवाद था, जैसा कि 17 जुलाई 2024 की पुलिस रिपोर्ट में दर्ज है। यह तर्क दिया गया कि एफआईआर खारिज किए गए धारा 156(3) आवेदन के समान आरोपों पर कार्यवाही का अनुचित दूसरा दौर है। मोहन कार्तिक बनाम तमिलनाडु राज्य का हवाला देते हुए अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि धारा 156(3) के गुण-दोष के आधार पर खारिज होने के बाद शिकायतकर्ता का एकमात्र उपाय धारा 200 CrPC के तहत शिकायत दर्ज कराना था। इसके अलावा, हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल, नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर बनाम महाराष्ट्र राज्य, और प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, समझौता भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 23 के तहत शून्य था, और एफआईआर दुर्भावनापूर्ण थी।

राज्य के वकील ने प्रस्तुत किया कि एफआईआर धारा 156(3) आवेदन के खारिज होने के बाद प्रस्तुत की गई नई सामग्री के आधार पर दर्ज की गई थी, जिसमें पेन ड्राइव में ऑडियो रिकॉर्डिंग, लेनदेन का विवरण और जाली प्रवेश पत्र तथा परिणाम शामिल थे। वी. रवि कुमार बनाम राज्य, शिवशंकर सिंह बनाम बिहार राज्य, और अंजू चौधरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए राज्य ने तर्क दिया कि जब नई सामग्री या भिन्न तथ्यों पर आधारित हो तो बाद की एफआईआर पर कोई रोक नहीं है। यह भी प्रस्तुत किया गया कि अपीलकर्ता के खिलाफ दो पुलिस स्टेशनों में इसी तरह की प्रकृति की पांच अन्य एफआईआर दर्ज थीं। मैसर्स जयंत विटामिन्स लिमिटेड बनाम चैतन्यकुमार पर भरोसा करते हुए राज्य ने तर्क दिया कि अदालतों को वैधानिक पुलिस जांच में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

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अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, देवरापल्ली लक्ष्मीनारायण रेड्डी बनाम वी. नारायणा रेड्डी, एसएएस इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम तेलंगाना राज्य, और विनुभाई हरिभाई मालवीय बनाम गुजरात राज्य का संदर्भ लेते हुए CrPC की धारा 154, 156(3) और 190 को नियंत्रित करने वाली वैधानिक योजना का परीक्षण किया।

धारा 156(3) CrPC के दायरे पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:

“सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत पारित आदेश संहिता के अध्याय XII के तहत जांच की वैधानिक शक्ति का प्रयोग करने का निर्देश देने या मना करने तक ही सीमित है। ऐसा आदेश न तो आरोपों के गुणों पर कोई अधिनिर्णय करता है और न ही प्रस्तावित आरोपी के किसी अधिकार या दायित्व का निर्धारण करता है।”

पूर्व न्याय (रेस जुडीकाटा) के सिद्धांत को संबोधित करते हुए अदालत ने एस.सी. गर्ग बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में अपने पूर्व निर्णय का उल्लेख किया, जिसने प्रितम सिंह बनाम पंजाब राज्य, भगत राम बनाम राजस्थान राज्य, और राजस्थान राज्य बनाम ताराचंद जैन जैसे उदाहरणों का देवेंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और मुस्कान एंटरप्राइजेज बनाम पंजाब राज्य के साथ सामंजस्य स्थापित किया था। पीठ ने माना कि रेस जुडीकाटा केवल वहीं लागू होता है जहां मुकदमे के बाद गुण-दोष पर मुद्दे का अंतिम निर्धारण हुआ हो।

अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा:

“इसी सिद्धांत को लागू करते हुए, सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत किसी आवेदन को खारिज किया जाना, जो कि मुकदमे (ट्रायल) के बाद गुण-दोष के आधार पर किसी अधिनिर्णय के बिना प्रारंभिक स्तर पर दिया गया आदेश है, ऐसी अंतिम रूपता प्राप्त नहीं कर सकता जिससे रेस जुडीकाटा (पूर्व न्याय) का सिद्धांत लागू हो और उसी या समान आरोपों पर बाद में प्राथमिकी दर्ज करने या आपराधिक कार्यवाही जारी रखने पर रोक लगे।”

महेंद्री बनाम यूपी राज्य में प्रतिपादित सिद्धांत की पुष्टि करते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि:

“उपरोक्त प्रार्थना को खारिज करने से विवाद के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और न ही यह शिकायतकर्ता द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की सच्चाई को दर्शाएगा जो बाद में दर्ज की गई थी…”

अदालत ने आगे रेखांकित किया कि संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाली जानकारी मिलने पर एफआईआर दर्ज करने का पुलिस का कर्तव्य सीधे धारा 154 CrPC से उत्पन्न होता है, जैसा कि संविधान पीठ ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार में निर्णय दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया:

“सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत किसी आवेदन की अस्वीकृति पुलिस पर सीआरपीसी की धारा 154 के तहत दी गई स्वतंत्र वैधानिक बाध्यता को सीमित या समाप्त नहीं कर सकती है।”

मोहन कार्तिक बनाम तमिलनाडु राज्य के मामले को अलग करते हुए अदालत ने ध्यान दिलाया कि वह मामला धारा 156(3) CrPC के तहत दूसरे आवेदन की पोषणीयता से संबंधित था, जबकि वर्तमान मामला धारा 154 CrPC के तहत दर्ज एक स्वतंत्र एफआईआर से संबंधित है।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि एफआईआर के आरोप प्रथम दृष्टया आईपीसी के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात और आपराधिक धमकी सहित संज्ञेय अपराधों का खुलासा करते हैं। अदालत ने कहा कि बैंक लेनदेन, पिछली पुलिस रिपोर्ट और साक्ष्य मूल्य के संबंध में अपीलकर्ता के तर्क मुकदमे में साक्ष्य के मूल्यांकन के दायरे में आते हैं। हाईकोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: प्रमोद कुमार शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य

वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 3931/2026 (एस.एल.पी. (आपराधिक) संख्या 12908/2025 से उद्भूत)

पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, जस्टिस एन.वी. अंजारिया

निर्णय की तिथि: 19 अगस्त 2026

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