मध्यस्थता पुरस्कारों में संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के मध्यस्थता और सुलह अधिनियम के तहत अदालतों को मध्यस्थता पुरस्कारों में संशोधन करने का अधिकार है या नहीं, इस विवादित मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मुद्दा भारत में मध्यस्थता प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इसे लेकर कानूनी समुदाय में व्यापक चर्चा हो रही है। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष तीन दिनों तक सुनवाई चली।

मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति संजय कुमार, न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे, ने इस मामले पर वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनीं। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार, दारियस खंबाटा, शेखर नफाडे और रितिन राय ने अपने-अपने पक्ष रखे।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 13 फरवरी को केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि मध्यस्थता पुरस्कारों में संशोधन का अधिकार विधायिका के अंतर्गत ही रहना चाहिए ताकि देश की बदलती मध्यस्थता आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। इसके विपरीत, वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने दलील दी कि जब अदालतों को कुछ विशेष आधारों पर मध्यस्थता पुरस्कार रद्द करने का अधिकार प्राप्त है, तो उन्हें इन पुरस्कारों में संशोधन का अधिकार भी होना चाहिए।

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वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाडे ने भी दातार की बात का समर्थन करते हुए कहा कि अदालतों को मध्यस्थता पुरस्कारों में आवश्यक संशोधन करने का अधिकार मिलना चाहिए। यह बहस न्यायिक निगरानी और मध्यस्थता न्यायाधिकरणों की स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को उजागर करती है।

इस विवादित मुद्दे को तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने 23 जनवरी को संविधान पीठ के पास भेज दिया था, ताकि इस जटिल कानूनी प्रश्न पर व्यापक विचार किया जा सके। मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत मध्यस्थता का उद्देश्य अदालतों के हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए निजी मध्यस्थता पैनलों को विवादों के समाधान के लिए सक्षम बनाना है।

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अधिनियम की धारा 34 अदालतों को केवल कुछ सीमित परिस्थितियों में ही मध्यस्थता पुरस्कार रद्द करने की अनुमति देती है, जैसे प्रक्रिया संबंधी अनियमितता, सार्वजनिक नीति का उल्लंघन या अधिकार क्षेत्र की कमी। इसी तरह, धारा 37 मध्यस्थता से संबंधित आदेशों के खिलाफ अपील की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है और न्यायिक हस्तक्षेप को केवल अपवादात्मक मामलों तक सीमित रखती है।

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