सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें बेदखली की डिक्री पलटने के खिलाफ दायर रिट याचिका को केवल इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि याचिकाकर्ता ने नए तथ्यों पर कोई प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल नहीं किया था। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों की जांच करने के बजाय केवल तकनीकी आधार पर याचिका खारिज कर अपने अधिकार क्षेत्र का सही उपयोग नहीं किया। शीर्ष अदालत ने अब इस मामले को मुंबई की स्मॉल कॉज कोर्ट में नए सिरे से सुनवाई के लिए भेज दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मुंबई के परेल स्थित इकबाल मंजिल के कमरा नंबर 59 और 63 से जुड़ा है। अपीलकर्ता मारिया मार्टिन्स, स्वर्गीय फ्रांसिस पॉल सिग्नटमार्टिन्स की कानूनी वारिस हैं। कमरा नंबर 59 में प्रतिवादी (नोएल ज़ुज़ार्टे और अन्य) उप-किरायेदार के रूप में रह रहे थे।
दिसंबर 1994 में, मार्टिन्स के वारिसों ने ‘बॉम्बे रेंट्स, होटल एंड लॉजिंग हाउस रेट्स कंट्रोल एक्ट, 1947’ की धारा 28 के तहत परिवार की ‘वास्तविक आवश्यकता’ (Bonafide Need) के आधार पर बेदखली का मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 18 जुलाई 2001 को किरायेदारों को बेदखल करने का आदेश दिया, यह मानते हुए कि परिवार की वृद्ध विधवा और अन्य सदस्यों के लिए जगह की जरूरत वास्तविक है।
हालांकि, पहली अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया। अदालत का तर्क था कि चूंकि सुनवाई के दौरान मूल वादी (विधवा) का निधन हो गया, इसलिए अब बेदखली की जरूरत खत्म हो गई है। इसके बाद अपीलकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
प्रतिवादियों के तर्क और हाईकोर्ट का निष्कर्ष
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान, प्रतिवादियों ने 12 अप्रैल 2023 को एक हलफनामा दाखिल किया। इसमें दावा किया गया कि कमरा नंबर 63, जो वादी के कब्जे में था, उसे किसी अन्य को किराये पर दे दिया गया है। प्रतिवादियों का तर्क था कि यदि वादी के पास कमरा खाली था और उन्होंने उसे किराये पर दे दिया, तो उनकी अपनी जरूरत ‘वास्तविक’ नहीं हो सकती।
हाईकोर्ट ने पाया कि वादी ने इस हलफनामे का कोई प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल नहीं किया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि चूंकि वादी ने तथ्यों का खंडन नहीं किया, इसलिए यह मान लिया जाना चाहिए कि उनकी जरूरत वास्तविक नहीं है। हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को त्रुटिपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि केवल प्रत्युत्तर न होने के कारण याचिका खारिज करना न्यायसंगत नहीं है। जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर ने फैसले में उल्लेख किया:
“हमारे विचार में, केवल खंडन न होने (Non-traverse) के आधार पर रिट याचिका को खारिज करना दोषपूर्ण है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि बाद में होने वाली घटनाओं (Subsequent Events) को ध्यान में रखते समय अदालतों को यह देखना चाहिए कि क्या वे घटनाएँ मूल मांग को पूरी तरह से खत्म कर देती हैं। कोर्ट ने Atma S. Berar Vs. Mukhtiar Singh (2002) का संदर्भ देते हुए कहा कि ऐसी घटनाओं का मामले के परिणाम पर सीधा और भौतिक प्रभाव होना चाहिए।
अदालत ने Maganlal son of Kishanlal Godha Vs. Nanasaheb son of Udhaorao Gadewar (2008) मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था:
“वास्तविक आवश्यकता का निर्धारण उस तिथि से होना चाहिए जब मुकदमा दायर किया गया था, सिवाय उन परिस्थितियों के जहां बाद की घटनाओं ने राहत के आधार को पूरी तरह बदल दिया हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि Gaya Prasad v. Pradeep Srivastava (2001) के अनुसार, बाद की घटनाओं को मकान मालिक की जरूरतों पर तभी हावी माना जा सकता है जब वे इतनी महत्वपूर्ण हों कि मूल जरूरत अपना महत्व पूरी तरह खो दे।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- बॉम्बे हाईकोर्ट का 4 फरवरी 2025 का आदेश रद्द किया जाता है।
- मुकदमा संख्या R.A.E. 70/1995 को मुंबई की स्मॉल कॉज कोर्ट में नए सिरे से निर्णय लेने के लिए वापस (Remand) भेजा जाता है।
- दोनों पक्षों को अपने दावों की पुष्टि के लिए याचिकाओं में संशोधन करने और अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की अनुमति दी गई है।
- ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह पार्टियों के पेश होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर मामले का निपटारा करने का प्रयास करे।
- दोनों पक्षों को 22 अप्रैल 2026 को स्मॉल कॉज कोर्ट, मुंबई के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुणों (Merits) पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और सभी मुद्दे ट्रायल कोर्ट के लिए खुले रखे गए हैं।
मामले का विवरण
केस टाइटल: मारिया मार्टिन्स बनाम नोएल ज़ुज़ार्टे और अन्य
केस नंबर: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (@SLP (C) No. 11349 of 2025) – 2026 INSC 376
पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

