सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत 1.465 किलोग्राम हेरोइन की बरामदगी के मामले में दो आरोपियों को नियमित जमानत दी गई थी। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया कि एनडीपीएस (NDPS) एक्ट, 1985 की धारा 37 के तहत निर्धारित “दोहरी शर्तों” (twin conditions) को केवल लंबी हिरासत या त्वरित सुनवाई (speedy trial) के अधिकार के आधार पर शिथिल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने कानूनी प्रावधानों को “हल्का” (dilute) करने में गलती की और आरोपियों द्वारा तथ्यों को छिपाने पर ध्यान नहीं दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला तरनतारन जिले के पुलिस स्टेशन खालरा में दर्ज एफआईआर नंबर 06/2024 से संबंधित है। 10 जनवरी 2024 को पुलिस ने एक वाहन की तलाशी के दौरान सुखविंदर सिंह उर्फ गोरा से 957 ग्राम और गुरजीत सिंह उर्फ गीतू से 508 ग्राम हेरोइन बरामद की थी। कुल 1.465 किलोग्राम हेरोइन की यह मात्रा एनडीपीएस एक्ट के तहत “व्यावसायिक मात्रा” (commercial quantity) की श्रेणी में आती है।
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 18 फरवरी 2026 को दोनों आरोपियों को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट का तर्क था कि आरोपी दो साल से अधिक समय से जेल में हैं, 24 में से केवल 2 गवाहों की जांच हुई है और ट्रायल पूरा होने में समय लगेगा। हाईकोर्ट ने कहा था कि “त्वरित सुनवाई के अधिकार को ध्यान में रखते हुए धारा 37 की कठोरता को कम किया जा सकता है।”
पक्षों की दलीलें
पंजाब राज्य (अपीलकर्ता) ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि व्यावसायिक मात्रा के मामलों में जमानत देने से पहले धारा 37(1)(b)(ii) के तहत संतुष्टि दर्ज करना अनिवार्य है। राज्य ने NCB बनाम काशिफ और मेघालय राज्य बनाम लालरिंतलुआंगा सैलो जैसे फैसलों का हवाला दिया। राज्य की ओर से यह भी दलील दी गई कि पंजाब में नशीली दवाओं के खतरे को देखते हुए अदालतों को जमानत देने में अत्यंत सतर्क रहना चाहिए।
प्रतिवादियों (आरोपियों) का तर्क था कि अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार को धारा 37 के यांत्रिक अनुप्रयोग (mechanical application) से खत्म नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 42, 50 और 52 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है और सभी गवाह केवल पुलिस कर्मी हैं।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देते हुए कहा कि धारा 37(1)(b)(ii) अनिवार्य है। इसके तहत कोर्ट को यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि आरोपी के दोषी न होने के उचित आधार हैं और जमानत पर रहने के दौरान उसके अपराध करने की संभावना नहीं है।
1. अनुच्छेद 21 और धारा 37 का सामंजस्य कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस नजरिए को खारिज कर दिया जिसमें ट्रायल में देरी के आधार पर धारा 37 की शर्तों को “हल्का” करने की बात कही गई थी। पीठ ने टिप्पणी की:
“अनुच्छेद 21 के तहत संवैधानिक अधिकार और एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत कानून के विशेष प्रावधान को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए, न कि एक-दूसरे के विरोध में। धारा 37 की दोहरी शर्तों पर अपनी संतुष्टि दर्ज न करके हाईकोर्ट ने गलती की है।”
2. तथ्यों को छिपाना और रिकॉर्ड की अनदेखी सुखविंदर सिंह के मामले में कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने उसे “किसी अन्य मामले में शामिल नहीं” बताया, जबकि आरोपी ने खुद अपनी याचिका में स्वीकार किया था कि उसके खिलाफ एक और एफआईआर लंबित है। कोर्ट ने इसे तथ्यों के विपरीत बताया।
वहीं, गुरजीत सिंह के मामले में यह पाया गया कि हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने उसकी पिछली जमानत याचिका 27 अगस्त 2025 को खारिज कर दी थी, जिसे बाद की याचिका में स्पष्ट रूप से उजागर नहीं किया गया था। कोर्ट ने कहा:
“ऐसा खुलासा जो स्पष्ट करने के बजाय तथ्यों को धुंधला करने के लिए किया गया हो, कानून की नजर में खुलासा नहीं माना जा सकता।”
3. नशीली दवाओं के खतरे पर चेतावनी पीठ ने परविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि नशीली दवाओं के खतरे से जूझ रहे क्षेत्रों में दोहराव करने वाले अपराधियों को जमानत देते समय अदालतों को अत्यधिक सावधान रहना चाहिए।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 18 फरवरी 2026 के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने दोनों आरोपियों को एक सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आत्मसमर्पण के बाद आरोपी सक्षम अदालत में नए सिरे से जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं।
केस विवरण ब्लॉक
- केस का शीर्षक: पंजाब राज्य बनाम सुखविंदर सिंह @ गोरा (और पंजाब राज्य बनाम गुरजीत सिंह @ गीतू)
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील (एसओपी (Crl.) सं. 5020/2026 और 5075/2026 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
- दिनांक: 24 अप्रैल, 2026

