मानसिक स्वास्थ्य और छात्र आत्महत्या संबंधी दिशा-निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगी राज्यों और केंद्र से रिपोर्ट, जनवरी 2026 में अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (27 अक्टूबर) को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे आठ सप्ताह के भीतर यह बताएं कि शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और आत्महत्याओं से निपटने के लिए जारी दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार को भी आठ सप्ताह का समय देते हुए एक विस्तृत अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें अब तक उठाए गए कदमों का ब्यौरा देना होगा।

यह निर्देश उस मामले की सुनवाई के दौरान आया जिसमें शीर्ष अदालत के 25 जुलाई के फैसले के अनुपालन की स्थिति पर चर्चा हो रही थी। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संकट और आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं से निपटने के लिए 15 दिशा-निर्देश जारी किए थे।

अदालत ने उस समय यह टिप्पणी की थी कि देश में छात्रों की आत्महत्या की रोकथाम और मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए “विधायी और नियामक रिक्तता” है। इस शून्य को भरने के लिए अदालत ने कहा था कि जब तक उपयुक्त कानून या विनियम नहीं बन जाते, ये दिशा-निर्देश बाध्यकारी रहेंगे।

अदालत ने यह भी कहा था कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश, जहाँ तक संभव हो, दो महीने के भीतर निजी कोचिंग संस्थानों के लिए पंजीकरण, छात्र संरक्षण मानदंड और शिकायत निवारण तंत्र को अनिवार्य करने वाले नियम अधिसूचित करें।

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सोमवार की सुनवाई में अदालत ने यह भी आदेश दिया कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस मामले में पक्षकार बनाया जाए ताकि उनके-अपने अनुपालन की स्थिति का मूल्यांकन किया जा सके। अदालत ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2026 में की जाएगी।

पीठ को बताया गया कि जुलाई के फैसले के अनुसार केंद्र सरकार को 90 दिनों के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करना था।

जुलाई के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सभी शैक्षणिक संस्थान एक समान मानसिक स्वास्थ्य नीति अपनाएं और उसे लागू करें। यह नीति शिक्षा मंत्रालय की ‘उम्मीद’ (Understand, Motivate, Manage, Empathise, Empower, and Develop) गाइडलाइन्स, ‘मनोदर्पण’ पहल और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति से प्रेरित होनी चाहिए।

अदालत ने कहा था कि इस नीति की वार्षिक समीक्षा की जाए और इसे संस्थान की वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाए।

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अदालत ने केंद्र सरकार के पूर्व प्रयासों का भी उल्लेख किया था—जैसे कि 2023 में जारी ‘उम्मीद’ गाइडलाइन्स, जिनका उद्देश्य छात्रों के प्रति संवेदनशीलता और सहानुभूति बढ़ाना है, और कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू की गई ‘मनोदर्पण’ पहल, जो छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण पर केंद्रित है।

यह मामला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश से संबंधित अपील से उत्पन्न हुआ था, जिसमें विशाखापत्तनम में 17 वर्षीय नीट अभ्यर्थी की अस्वाभाविक मृत्यु की जांच सीबीआई को सौंपने से इनकार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए छात्र आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य के व्यापक मुद्दे को उठाया और पूरे देश के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए।

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