सुप्रीम कोर्ट ने विश्वभारती विश्वविद्यालय के पास हाउसिंग प्रोजेक्ट को दी मंजूरी, कलकत्ता हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के विश्वभारती विश्वविद्यालय के पास एक निजी आवासीय परियोजना को हरी झंडी दे दी और कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें निर्माण को गिराने का निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस भूमि को हाईकोर्ट ने “खोई” बताया था, वैसी कोई कानूनी श्रेणी बंगाल के राजस्व कानूनों में मौजूद नहीं है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि “खोई” शब्द नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की साहित्यिक रचनाओं से लिया गया है, जो बीरभूम क्षेत्र में पाए जाने वाले लाल लेटराइट मिट्टी से बने प्राकृतिक कटाव और गड्ढों के लिए प्रयुक्त होता है। परंतु यह केवल साहित्यिक वर्णन है, कोई कानूनी ज़मीन की श्रेणी नहीं।

अदालत ने कहा, “राजस्व रिकॉर्ड में ‘खोई’ नामक कोई ज़मीन की श्रेणी नहीं है। हाईकोर्ट ने सिर्फ साहित्यिक आधार पर इसे संरक्षित भूमि मान लिया, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं।”

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कोर्ट ने निजी बिल्डर Aarsuday Projects द्वारा किए गए निर्माण को वैध माना और कहा कि परियोजना को सभी आवश्यक स्वीकृतियाँ प्राप्त थीं। रूपपुर ग्राम पंचायत ने 5 नवंबर, 2011 को निर्माण योजना को मंजूरी दी थी।

पीठ ने कहा, “मान भी लें कि ज़मीन को ‘डांगा’ (बंजर भूमि) से ‘बस्तु’ (आवासीय) में बदलने की प्रक्रिया में कोई त्रुटि रही हो, तो भी यह निर्माण को अवैध नहीं बनाता और इसे गिराने जैसा कठोर कदम उठाना उचित नहीं।”

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सुप्रीम कोर्ट ने PIL दायर करने वाले याचिकाकर्ताओं पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया और कहा कि उन्होंने यह तथ्य छिपाया कि वे स्वयं विवादित निर्माण स्थल के पास पहले से रहते हैं। कोर्ट ने इसे “चुनिंदा और पूर्वाग्रहपूर्ण चुनौती” बताते हुए PIL की आलोचना की।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई स्पष्ट दस्तावेज़ी प्रमाण पेश नहीं कर सके कि निर्माण वास्तव में “खोई” भूमि पर हुआ था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका (PIL) का उपयोग व्यक्तिगत या लक्षित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नहीं किया जा सकता। “जनहित याचिका को चयनात्मक या द्वेषपूर्ण चुनौती का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता,” पीठ ने कहा।

इस परियोजना का स्थान शांतिनिकेतन स्थित विश्वभारती विश्वविद्यालय के पास है, जिसे टैगोर ने स्थापित किया था। हाईकोर्ट ने सांस्कृतिक और पर्यावरणीय चिंता के आधार पर निर्माण को गिराने का निर्देश दिया था, यह कहते हुए कि यह “खोई” भूमि है जिसे संरक्षित किया जाना चाहिए।

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लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब निर्माण के लिए विधिसम्मत अनुमति प्राप्त की गई हो और कोई धोखाधड़ी न हो, तो सौंदर्य या सांस्कृतिक तर्क के आधार पर उसे गिराना उचित नहीं है।

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