‘उद्योग’ की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख: 9-जजों की बेंच ने कहा—पुराने कानून के लंबित मामलों पर लागू होगा नया फैसला

सुप्रीम कोर्ट की 9-जजों की संविधान बेंच ने बुधवार को स्पष्ट किया कि 1978 के एक ऐतिहासिक फैसले की सटीकता पर उसका आगामी निर्णय, अब निरस्त हो चुके ‘औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947’ (Industrial Disputes Act, 1947) के तहत चल रहे सभी मौजूदा मामलों पर लागू होगा। 1978 के उस फैसले ने ‘उद्योग’ शब्द की व्यापक व्याख्या की थी, जिससे श्रम संबंधों के दायरे में बड़ा विस्तार हुआ था।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के नेतृत्व वाली यह बेंच 1978 के ‘बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड’ मामले में निर्धारित ‘ट्रिपल टेस्ट’ (Triple Test) की समीक्षा कर रही है। उस ऐतिहासिक फैसले ने अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों, क्लबों और सरकारी कल्याण विभागों में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों को श्रम कानूनों के संरक्षण के दायरे में ला दिया था।

यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब 1947 के अधिनियम की जगह ‘औद्योगिक संबंध संहिता, 2020’ (Industrial Relations Code, 2020) ले चुकी है, जो 2025 से प्रभावी हुई है। सुनवाई के दौरान, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कानून में बदलाव के बावजूद इस संदर्भ (Reference) की प्रासंगिकता पर उठ रहे सवालों का जवाब दिया।

जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की, “अब जो कुछ भी कहा जाएगा, वह पुराने कानून के तहत मौजूदा मामलों पर लागू होगा। संक्षेप में बात यही है।”

वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह द्वारा 1947 के अधिनियम के निरस्त होने का तर्क दिए जाने पर, जस्टिस दीपांकर दत्ता ने इस विचार को चुनौती दी कि बेंच को इस संदर्भ का उत्तर नहीं देना चाहिए। जस्टिस दत्ता ने पूछा, “संदर्भ भेजा जा चुका है। अब, हमें कोई ऐसा अधिकार दिखाएं जो कहता हो कि इन परिस्थितियों में 9-जजों की बेंच को (संदर्भ का) जवाब नहीं देना चाहिए।”

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इस पूरी कार्यवाही के केंद्र में 7-जजों की बेंच द्वारा 1978 में दिया गया फैसला है। जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर द्वारा लिखे गए उस फैसले ने स्थापित किया था कि कोई इकाई ‘उद्योग’ है यदि उसमें:

  1. व्यवस्थित गतिविधि (Systematic activity) हो;
  2. नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच सहयोग हो;
  3. वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता हो।

इस व्यापक व्याख्या का विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा लंबे समय से विरोध किया जाता रहा है। मामले में पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने राज्यों के इस विरोध की आलोचना की और इसे निजी पक्षों की ओर से की जा रही “सरोगेट मुकदमेबाजी” करार दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि 1947 का अधिनियम एक “हितकारी कानून” था, जिसका उद्देश्य श्रमिकों को सेवा की सुरक्षा और उत्पीड़न या गलत तरीके से बर्खास्तगी के खिलाफ न्याय तक पहुंच प्रदान करना था।

CJI सूर्यकांत ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए कहा, “औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 एक हितकारी कानून है और श्रमिक कुछ प्रकार के वैधानिक संरक्षण के हकदार हैं।”

बेंच ने सुनवाई के लिए कई प्रमुख मुद्दे तय किए हैं, जिनमें मुख्य रूप से यह देखना है कि क्या 1978 का ‘बेंगलुरु वाटर सप्लाई’ मामला अब भी “सही कानून” है। कोर्ट इस बात की भी जांच कर रहा है कि क्या सरकारी विभागों द्वारा चलाए जा रहे सामाजिक कल्याण कार्यों और योजनाओं को 1947 के अधिनियम की धारा 2(j) के तहत “औद्योगिक गतिविधियां” माना जा सकता है।

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CJI ने स्पष्ट किया कि कोर्ट का ध्यान मूल प्रावधान की व्याख्या पर है। बेंच ने पहले कहा था, “अगर वह व्याख्या गलत थी, अगर उस प्रावधान को इतना व्यापक अर्थ देकर पूरी तरह से गलत समझा गया था, तो हम अपनी गलती सुधारेंगे।”

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि कोर्ट की वर्तमान व्याख्या केवल निरस्त हो चुके 1947 के कानून के संदर्भ में है और इसका विस्तार 2020 के नए कोड पर नहीं होता है।

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इस 9-जजों की बेंच में CJI सूर्यकांत के साथ जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्ज्वल भुयान, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल हैं। मामले में दलीलें गुरुवार को भी जारी रहेंगी।

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