सुप्रीम कोर्ट ने ‘लालच’ पर रवींद्रनाथ टैगोर के कथन का हवाला देते हुए डॉ. सुब्बैया हत्याकांड में दोषियों की सजा बहाल की

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसके तहत साल 2013 में चेन्नई के जाने-माने डॉक्टर डॉ. सुब्बैया की दिन-दहाड़े की गई हत्या के सभी नौ आरोपियों को बरी कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) द्वारा आरोपियों को दोषी ठहराने के फैसले को सही मानते हुए बहाल किया और सात दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

मामले के मानवीय और सहानुभूतिपूर्ण पहलुओं को देखते हुए, कोर्ट ने दो बुजुर्ग दोषियों—पी. पोन्नुसामी (A1) और मेरी पुष्पम (A2), जो दो अन्य सह-साजिशकर्ताओं के माता-पिता हैं—की सजा को आठ सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया है। कोर्ट ने उन्हें संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत तमिलनाडु के राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर करने की अनुमति प्रदान की है।

पीठ ने अपने फैसले की शुरुआत रवींद्रनाथ टैगोर की इन प्रसिद्ध पंक्तियों से की:

“लाभ की लालसा की क्षमता की कोई सीमा या समय नहीं होता। इसका एकमात्र उद्देश्य उत्पादन और उपभोग करना है। इसे न तो सुंदर प्रकृति पर दया आती है और न ही जीवित मनुष्यों पर। यह सुंदरता और जीवन को कुचलने के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के बेरहमी से तैयार रहता है।”

अदालत ने टिप्पणी की कि इस मामले में टैगोर के इन शब्दों का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक था क्योंकि यह मामला इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे मनुष्य अपने लालच को पूरा करने के लिए मानवीय व्यवहार की सभी सीमाओं को पार कर जाते हैं और दूसरों के जीवन को कुचलने के स्तर तक चले जाते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिलरोथ अस्पताल, राजा अन्नामलाईपुरम, चेन्नई में कार्यरत एक प्रतिष्ठित डॉक्टर डॉ. सुब्बैया की हत्या से जुड़ा है। 14 सितंबर 2013 को शाम करीब 05:00 बजे जब डॉक्टर अस्पताल से बाहर निकले, तो तीन लोगों—मुरुगन (A8), सेल्वा प्रकाश (A9) और एक सहयोगी (A10, जो बाद में सरकारी गवाह बना और उसे PW12 के रूप में परीक्षित किया गया)—ने उन पर हंसिए (सिक्ल) से हमला कर दिया। इस हमले में उनके सिर, गर्दन, कंधे और दाहिने हाथ पर गंभीर चोटें आईं। डॉ. सुब्बैया को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान 23 सितंबर 2013 को उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद मामले को धारा 307 आईपीसी से बदलकर धारा 302 आईपीसी (हत्या) के तहत दर्ज किया गया।

जांच में सामने आया कि कन्याकुमारी जिले के अंजुग्रामम गाँव में 2 एकड़ जमीन के मालिकाना हक को लेकर डॉ. सुब्बैया और मुख्य अभियुक्त पोन्नुसामी (A1) के परिवार के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। डॉ. सुब्बैया द्वारा आरोपियों के खिलाफ लगातार आपराधिक शिकायतें दर्ज कराने और उनकी अग्रिम जमानत रद्द करने की अर्जी लगाने से नाराज होकर आरोपियों ने उनकी हत्या की साजिश रची, ताकि डॉक्टर की मौत के बाद जमीन पर कोई कानूनी अड़चन न रहे।

अभियोजन पक्ष ने साजिश की बैठकों की एक कतार पेश की:

  • पहली बैठक (जुलाई 2013 का पहला सप्ताह): बेसिल (A3), विलियम (A5), येसुराजन (A6), डॉ. जेम्स सतीश कुमार (A7) और PW12 के बीच बैठक हुई, जिसमें हत्यारों को काम पर रखने की योजना बनी। इसमें A1 और A2 भी शामिल हुए और काम पूरा होने पर संपत्ति की आधी कीमत देने का वादा किया।
  • दूसरी बैठक (जुलाई 2013 का अंतिम सप्ताह): विवादित भूमि पर एक बैठक हुई जिसमें भूमि दलाल (PW4 और PW5) भी शामिल थे। वहां डॉ. सुब्बैया की नामपट्टिका देखकर दलालों के पूछने पर A5 ने कहा कि जल्द ही सुब्बैया का अंत हो जाएगा।
  • पैसों का लेन-देन: A1 और A3 द्वारा A5 को नकद ट्रांसफर किया गया, जिसने ₹6.5 लाख की राशि किस्तों में A6 के बहनोई (DW2) को भेजी। इस राशि को निकाल कर बाद में हमलावरों (A8, A9 और PW12) में बांट दिया गया।
  • पहला असफल प्रयास: 14 अगस्त 2013 को आरोपी पहली बार चेन्नई पहुंचे लेकिन योजना को अंजाम नहीं दे पाए।
  • हत्या का निष्पादन: अंततः 14 सितंबर 2013 को आरोपियों ने एक पुरानी पल्सर मोटरसाइकिल खरीदी, अरुणा लॉज में ठहरे, और डॉक्टर के बाहर निकलने के समय की रेकी कर उन पर हमला कर दिया।
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ट्रायल कोर्ट ने सभी नौ अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। हालांकि, अपील किए जाने पर मद्रास हाईकोर्ट ने 14 जून 2024 को ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। इसके बाद तमिलनाडु राज्य और शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

दोनों पक्षों के तर्क

अभियोजन पक्ष (तमिलनाडु राज्य और शिकायतकर्ता) के तर्क:

  • ट्रायल कोर्ट का सजा का फैसला चश्मदीदों, परिस्थिति जन्य और वैज्ञानिक साक्ष्यों के मजबूत आधार पर टिका था।
  • हाईकोर्ट ने मामूली विरोधाभासों के आधार पर चश्मदीद गवाहों (PW2, PW3) और सरकारी गवाह (PW12) की विश्वसनीयता को खारिज करने में गंभीर भूल की।
  • अभियुक्तों द्वारा किए गए क्राइम सीन के री-इनेक्टमेंट को पूरी तरह से स्वैच्छिक माना जाना चाहिए, जो संविधान के अनुच्छेद 20(3) या साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 का उल्लंघन नहीं करता है।
  • अभियुक्तों के खुलासे के आधार पर बरामद हत्या का हथियार (M.O.1) साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत पूरी तरह स्वीकार्य है।

अभियुक्तों (A1 से A9) की ओर से दिए गए तर्क:

  • हाईकोर्ट द्वारा बरी किए जाने का फैसला पूरी तरह तर्कसंगत था। अभियोजन के गवाह (PW4, PW5, और PW53) अविश्वसनीय और मनगढ़ंत थे।
  • कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDRs) को साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत साबित नहीं किया गया क्योंकि किसी भी टेलीकॉम नोडल अधिकारी से पूछताछ नहीं की गई थी।
  • A5 के वकील ने तर्क दिया कि एक वकील और मुवक्किल के पेशेवर रिश्ते को आपराधिक रंग दिया गया है। साथ ही, PW12 को सरकारी गवाह बनाने की प्रक्रिया में पूर्वाग्रह की आशंका जताई गई। उन्होंने सरवन सिंह बनाम पंजाब राज्य और पी. कृष्ण मोहन रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य जैसे फैसलों पर भरोसा जताया।
  • अन्य अभियुक्तों ने दावा किया कि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है और क्राइम सीन री-इनेक्टमेंट का वीडियो अनुच्छेद 20(3) के तहत खुद के खिलाफ गवाही न देने के अधिकार का हनन करता है।
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कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

1. चश्मदीदों और साजिश के गवाहों की सत्यता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चश्मदीद गवाहों (PW2 और PW3) की गवाही घटना और हमलावरों की पहचान को लेकर पूरी तरह सुसंगत और विश्वसनीय है। मामूली अंतरालों को प्राकृतिक बताते हुए कोर्ट ने कहा कि एक आम गवाह अदालत के माहौल में थोड़ा असहज हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसकी पूरी गवाही झूठी है।

2. सरकारी गवाह (PW12) की भूमिका

हाईकोर्ट द्वारा सरकारी गवाह के पहले पुलिस बयान (धारा 161) और बाद में कोर्ट में दिए बयान के बीच विरोधाभासों के आधार पर उसे खारिज करने की कोर्ट ने आलोचना की:

“धारा 161 के तहत बयान दर्ज करने के समय, PW12 से एक अभियुक्त (A10) के रूप में पूछताछ की जा रही थी, न कि गवाह के रूप में। उस समय उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति खुद को बचाने की थी… ‘सच्चा और पूर्ण खुलासा’ वाक्यांश में ही यह बात छिपी है कि अभियुक्त ने पहले सच नहीं बताया था। इसलिए हाईकोर्ट का यह दृष्टिकोण पूरी तरह त्रुटिपूर्ण था।”

3. बरामदगी और साक्ष्य कड़ियां

हत्या में इस्तेमाल किए गए हथियार (M.O.1) की बरामदगी और उसकी अभियुक्तों से संबद्धता को कोर्ट ने पुख्ता माना। कोर्ट ने उस जिरह का भी उल्लेख किया जिसमें बचाव पक्ष ने गवाह (PW31) से खुद यह स्वीकार करवाया था कि आरोपियों ने उससे नारियल काटने के लिए चाकू लिया था, जो अप्रत्यक्ष रूप से उनकी संलिप्तता को साबित करता है।

4. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (CDR और गेट एनालिसिस) की अस्वीकार्यता

अदालत ने तकनीकी आधार पर CDR और CCTV गेट एनालिसिस रिपोर्ट को हाईकोर्ट द्वारा खारिज किए जाने के फैसले को सही माना, हालांकि स्पष्ट किया कि इससे मामले के अंतिम नतीजे पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अन्य प्रत्यक्ष साक्ष्य पर्याप्त हैं:

  • CDR: टेलीकॉम अधिकारियों को गवाह न बनाए जाने और धारा 65-बी के तहत वैध प्रमाण पत्र न होने के कारण यह साबित नहीं हो सका।
  • CCTV और गेट एनालिसिस: ऑरिजनल हार्ड डिस्क और DVR के नष्ट होने व खराब होने के कारण साक्ष्य की कड़ियां टूट गईं, जिससे मूल फुटेज की प्रामाणिकता संदिग्ध हो गई।

5. क्राइम सीन री-इनेक्टमेंट और अनुच्छेद 20(3) की व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इस धारणा को खारिज कर दिया कि क्राइम सीन का री-इनेक्टमेंट अभियुक्त को अपने ही खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर करता है:

“यदि री-इनेक्टमेंट केवल चलने या किसी दृश्य की नकल करने के निर्देश पर आधारित है, तो इसमें अभियुक्त के व्यक्तिगत ज्ञान का प्रकटीकरण नहीं होता है और इसे अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। लेकिन, यदि अभियुक्त को उसके स्वयं के ज्ञान के आधार पर अपराध के दृश्यों को प्रदर्शित करने के लिए प्रेरित किया जाता है, तो वह निश्चित रूप से आत्म-दोषारोपण की श्रेणी में आएगा और साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 व 26 के तहत वर्जित होगा।”

6. ‘संदेह का लाभ’ सिद्धांत का दुरुपयोग

पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी किए जाने की सख्त आलोचना की और कहा कि ‘संदेह का लाभ’ कोई काल्पनिक धारणा नहीं है:

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“आपराधिक अदालत का काम इस तरह के अस्पष्ट और साधारण संदेहों या काल्पनिक सिद्धांतों के आधार पर दोषियों को बरी करना नहीं है… एक दोषी व्यक्ति को बरी कर देना उतना ही खतरनाक है जितना कि एक निर्दोष को सजा देना।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की अपीलों को स्वीकार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के बरी करने के फैसले को रद्द कर दिया और निचली अदालत के दोषी ठहराने के फैसले को बहाल किया।

  • दोषसिद्धि की बहाली:
    • A1 (पी. पोन्नुसामी), A2 (मेरी पुष्पम) और A3 (बेसिल P.M.): इन्हें धारा 302 सहपठित धारा 120-बी और 120-बी आईपीसी के तहत दोषी ठहराया गया।
    • A4 (बोरिस P.M.): इन्हें धारा 302 सहपठित धारा 120-बी, और 120-B सहपठित 109 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया गया।
    • A5 (बी. विलियम), A6 (येसुराजन) और A7 (डॉ. जेम्स सतीश कुमार): इन्हें धारा 302 सहपठित धारा 120-बी और 120-बी आईपीसी के तहत दोषी ठहराया गया।
    • A8 (मुरुगन) और A9 (सेल्वा प्रकाश): इन्हें धारा 302, 302 सहपठित 34/120-बी, 341 और 120-बी आईपीसी के तहत दोषी ठहराया गया।
  • सजा: राज्य सरकार द्वारा मृत्युदंड के लिए दबाव न बनाए जाने के कारण कोर्ट ने सभी दोषियों को उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई है।
  • A1 और A2 के लिए विशेष राहत: दोषी पाए गए बुजुर्ग माता-पिता (A1 और A2) की उम्र और परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने मानवीय रुख अपनाया:
    “…अपने बच्चों की रक्षा और उनके प्रावधान की माता-पिता की स्वाभाविक प्रवृत्ति सबसे शक्तिशाली मानवीय इच्छाओं में से एक है, जो कभी-कभी तर्कसंगत सोच को धुंधला कर देती है… A1 और A2 ने इसमें बहुत सीमित भूमिका निभाई थी और बड़े पैमाने पर अपने बेटों के निर्देशानुसार काम किया था।”
    इस आधार पर कोर्ट ने उन्हें राज्यपाल के पास दया याचिका दायर करने की अनुमति दी है:
    • A1 और A2 को तमिलनाडु के राज्यपाल के समक्ष अनुच्छेद 161 के तहत दया याचिका दायर करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया है।
    • इस अवधि के दौरान उनकी सजा निलंबित रहेगी और उनकी गिरफ्तारी पर रोक होगी।
    • अन्य सभी दोषियों (A3 से A9) को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: तमिलनाडु राज्य बनाम पोन्नुसामी और अन्य
  • मामला संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2493-2502/2025 (क्रिमिनल अपील संख्या 2503-2512/2025 के साथ)
  • पीठ: जस्टिस एम. एम. सुंदरेश, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
  • फैसले की तारीख: 19 मई, 2026

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