“व्यक्तिगत स्वतंत्रता से बढ़कर कुछ नहीं”: सुप्रीम कोर्ट ने बेल में देरी पर हाईकोर्ट्स पर जताई नाराजगी; सख्त गाइडलाइन्स के संकेत

सुप्रीम कोर्ट ने देश के विभिन्न हाईकोर्ट्स में जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं के भारी बैकलॉग और सुनवाई में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने बुधवार को स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि हालात नहीं सुधरे, तो वह समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य दिशानिर्देश (Mandatory Guidelines) जारी करने के लिए बाध्य होगी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अदालतों में मुकदमों के प्रबंधन (Docket Management) को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट स्तर पर नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों को जिस “लचर तरीके” से संभाला जा रहा है, वह बेहद निराशाजनक है।

‘जेलों में सड़ रहे हैं लोग’

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां सनी चौहान बनाम हरियाणा राज्य मामले की सुनवाई के दौरान आईं। सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति की समीक्षा कर रही थी।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में कई जमानत याचिकाएं मई 2025 से लंबित हैं और बिना किसी प्रभावी सुनवाई के बार-बार स्थगित की जा रही हैं।

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इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए सीजेआई सूर्य कांत ने जोर देकर कहा कि भले ही अदालतों पर काम का भारी बोझ हो, लेकिन किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता अन्य विविध (miscellaneous) मामलों से ऊपर होनी चाहिए।

सीजेआई ने टिप्पणी की, “हम यह देखकर बेहद निराश हैं कि व्यक्तियों की स्वतंत्रता से जुड़ी प्रार्थनाओं पर विचार नहीं किया जा रहा है। डॉकेट भारी हो सकते हैं, लेकिन विविध मामलों में जमानत देने या इनकार करने की प्रार्थना से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं हो सकता।”

पटना हाईकोर्ट का भी जिक्र: व्यवस्था पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि यह समस्या केवल एक हाईकोर्ट तक सीमित नहीं है। पीठ ने पटना हाईकोर्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि वादी केवल यह शिकायत करने के लिए अलग से याचिकाएं दायर कर रहे हैं कि उनकी जमानत अर्जी लिस्ट नहीं हो रही है।

कोर्ट ने कहा कि जमानत मामलों के त्वरित निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों का “कोई वास्तविक प्रभाव” नहीं पड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है कि हाईकोर्ट्स ने समय पर सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए अपना कोई आंतरिक तंत्र विकसित नहीं किया है।

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एक महत्वपूर्ण अवलोकन में, पीठ ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की प्रशासनिक स्वायत्तता पर भी बात की। कोर्ट ने माना कि मुकदमों को सूचीबद्ध करना (listing) मुख्य न्यायाधीश का “विशेषाधिकार” है क्योंकि वे “रोस्टर के मास्टर” होते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जब नागरिकों की आजादी अधर में लटकी हो, तो शीर्ष अदालत मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती।

पीठ ने कहा, “हम इस तथ्य के प्रति सचेत हैं कि लिस्टिंग मुख्य न्यायाधीशों का विशेष अधिकार है। लेकिन लोग जेल में सड़ रहे हैं, जमानत याचिकाओं पर सुनवाई नहीं हो रही है और पूरी अनिश्चितता है कि उन्हें कब अपनी अर्जी का परिणाम पता चलेगा। ऐसे में, कुछ अनिवार्य दिशानिर्देश जारी करना इस अदालत का परम कर्तव्य है।”

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सभी हाईकोर्ट्स से मांगा गया डेटा

कोई भी व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने से पहले, सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रत्येक हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे अपने यहां लंबित सभी अग्रिम और नियमित जमानत याचिकाओं का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करें।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट उम्मीद जताई है कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोई समय-सारिणी थोपे जाने का इंतजार करने के बजाय, खुद सुधारात्मक कदम उठाएंगे ताकि उचित समय के भीतर याचिकाओं का निपटारा हो सके।

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