जिला क्रिकेट संघों में सुधार ज़रूरी, खेल में पारदर्शिता और सहभागिता बढ़ाई जाए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देशभर के राज्य क्रिकेट संघों से कहा कि वे अपने अधीनस्थ जिला संघों में व्यावसायिकता, पारदर्शिता और खेल हित में सुधार लागू करें। कोर्ट ने कहा कि खेल संस्थाएं सिर्फ कुछ लोगों की जागीर नहीं बननी चाहिए, बल्कि यह समावेशी और जनहितकारी बनें।

जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराध्य की पीठ ने यह टिप्पणी तिरुचिरापल्ली जिला क्रिकेट संघ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए की। यह याचिका मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देती है जिसमें मतदान और सदस्यता अधिकारों से संबंधित विवाद शामिल था।

पीठ ने स्पष्ट कहा:

“यह न केवल वैकल्पिक, बल्कि आवश्यक है कि राज्य संघ यह सुनिश्चित करें कि जिला संघ व्यावसायिक, पारदर्शी और खेल हित में संचालित हों।”

कोर्ट ने आगे कहा कि इन सुधारों में खिलाड़ियों के चयन की पारदर्शिता और अनुबंधों के निष्पादन की प्रक्रिया भी शामिल होनी चाहिए।

READ ALSO  कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में छह लोगों को बरी किया

“वास्तव में, जिला संघों को स्वयं आगे आकर सुधारात्मक उपाय अपनाने चाहिए, जैसे— सुशासन, परिष्कृत प्रबंधन, पारदर्शिता और हितों के टकराव से दूरी।”

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता संघ की सदस्यता और संरचना से संबंधित विवाद अभी भी हाईकोर्ट और वैधानिक प्राधिकरण के समक्ष लंबित हैं, जिन्हें शीघ्र निपटाया जाना चाहिए।

“हमारा मानना है कि इन प्रश्नों का निपटारा यथाशीघ्र किया जाना चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के बहाने खेलों के व्यापक सामाजिक महत्व पर भी टिप्पणी की:

“राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय या मोहल्ला स्तर के खेल कर्मभूमि के रूप में कार्य करते हैं, जहां एकजुटता और सामूहिक उद्देश्य वास्तविक रूप लेते हैं।”

“मैदान पर टीमवर्क व्यक्ति को निजी भेदभव भूलाकर सहयोग, एकजुटता और पारस्परिक सम्मान की भावना सिखाता है।”

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने जामा मस्जिद से संबंधित मनमोहन सिंह की गुम हुई फाइल के मामले में अधिकारियों को अंतिम मौका दिया

कोर्ट ने कहा कि खेलों में भागीदारी के अवसर सभी के लिए खुले होने चाहिए— चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक वर्ग से हों।

“यह समावेशिता सुनिश्चित करती है कि खेल कुछ लोगों की विशेषाधिकार प्राप्त वस्तु न बनें, बल्कि पूरे समाज में भाईचारे को मज़बूत करने का माध्यम बनें।”

पीठ ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि खेल सुविधाओं और अवसरों को सामुदायिक भौतिक संसाधन माना जाए।

“खेल संस्थानों को ‘सार्वजनिक स्थल’ माना जाना चाहिए— न सिर्फ खेलने के लिए, बल्कि उनके प्रशासन के लिए भी ये सबकी पहुंच में होने चाहिए।”

READ ALSO  दिल्ली हाई कोर्ट ने हाथी के स्वामित्व का दावा करने वाले व्यक्ति की खिंचाई की; उसे अदालत का उपयोग, शोषण न करने की चेतावनी दी

कोर्ट ने राज्य की यह जिम्मेदारी भी बताई कि वह खेल क्षेत्र में संस्थागत दक्षता, ईमानदारी, व्यावसायिकता और विशेषज्ञता सुनिश्चित करे।

कोर्ट ने आगाह किया कि खेलों में सुविधाएं और संसाधन केवल शहरी आर्थिक अभिजनों तक सीमित नहीं होने चाहिए:

“आवश्यक है कि खेल की सुविधाएं और अवसर शहरी आर्थिक अभिजनों के हाथों केंद्रित न हों, और खेल आयोजनों से प्राप्त राजस्व, बौद्धिक संपदा और मीडिया अधिकारों से प्राप्त आय का ऐसा वितरण हो जो देश में सुलभ और सस्ते खेलों को बढ़ावा दे।”

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles