छह साल तक फरार रहने वाले आरोपी को अग्रिम जमानत कैसे मिली? सुप्रीम कोर्ट ने MP हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश के एक 2017 के हत्या के मामले में छह साल से फरार चल रहे एक आरोपी को मिली अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ़ किया कि न्याय से भाग रहे आरोपी को अग्रिम जमानत देना कानून के शासन और न्याय प्रणाली की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।

न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति विजय विश्नोई की पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा जनवरी 2024 में दी गई अग्रिम जमानत को “पूरी तरह त्रुटिपूर्ण और विकृत” बताते हुए खारिज कर दिया और आरोपी को चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। हालांकि, उसे नियमित जमानत के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी गई है।

2 जून 2017 को मध्य प्रदेश में दो राजनीतिक गुटों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी—जो सह-आरोपी चंदन सिंह का बेटा है—एक हथियारबंद भीड़ का हिस्सा था, जिसने शिकायतकर्ता पक्ष पर तलवारों, डंडों और आग्नेयास्त्रों से हमला किया। इस हमले में एक व्यक्ति, बाबलू चौधरी की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे, जिनमें एक प्रत्यक्षदर्शी शैलेन्द्र उर्फ़ पिंटू भी शामिल थे।

इस घटना में शामिल कई सह-आरोपी गिरफ़्तार हुए, मुकदमा चला और जून 2023 में बरी हो गए। लेकिन वर्तमान आरोपी छह साल तक फरार रहा, उसकी गिरफ़्तारी पर इनाम घोषित हुआ और उसकी पिछली जमानत याचिकाएं खारिज होती रहीं।

जनवरी 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उसे सह-आरोपियों के बरी होने के आधार पर अग्रिम जमानत दे दी थी।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस जमानत आदेश को “पूर्णतः अनुचित” करार दिया और कहा:

“आरोपी को सह-आरोपियों की बरी होने की स्थिति का फ़ायदा नहीं दिया जा सकता, विशेषकर जब वह लगभग छह वर्षों तक फरार रहा और न्यायिक प्रक्रिया का मज़ाक उड़ाता रहा।”

न्यायमूर्ति विश्नोई ने स्पष्ट किया कि सामान्य नियम के रूप में किसी फरार व्यक्ति को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। सिर्फ उन्हीं मामलों में ऐसा हो सकता है, जहां प्राथमिकी और केस रिकॉर्ड में आरोपी के खिलाफ कोई ठोस सामग्री न हो—जो कि इस मामले में नहीं था।

पीठ ने यह भी नोट किया कि आरोपी ने न सिर्फ़ हमले में भाग लिया था, बल्कि घायल प्रत्यक्षदर्शी को जान से मारने की धमकी भी दी थी। यह भी अहम था कि मध्य प्रदेश राज्य सरकार ने भले स्वयं एसएलपी दाखिल न की हो, लेकिन उसने याचिकाकर्ता (शिकायतकर्ता) के मामले का समर्थन किया।

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“हम यह समझने में असमर्थ हैं कि राज्य ने अपील क्यों नहीं दायर की, जबकि वह पूरी तरह से याचिकाकर्ता के साथ था,” कोर्ट ने कहा।

पीठ ने चेताया कि ऐसे आदेशों से यह संदेश जाता है कि जो सह-आरोपी कानून का पालन करते हुए ट्रायल में शामिल हुए, उन्होंने ग़लत किया और न्याय प्रक्रिया से भागना एक बेहतर विकल्प है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी सभी टिप्पणियां केवल अग्रिम जमानत के संदर्भ में हैं और ये किसी भी नियमित जमानत याचिका या ट्रायल की कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेंगी।

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