सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल मां के कमाने के आधार पर नाबालिग बच्चों के प्रति पिता की वित्तीय जिम्मेदारी को आधा नहीं किया जा सकता। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दो नाबालिग बेटियों के अंतरिम भरण-पोषण (इंटरिम मैंटेनेंस) की राशि 30,000 रुपये प्रति माह प्रति बच्चा से घटाकर 15,000 रुपये प्रति माह प्रति बच्चा कर दी गई थी। शीर्ष अदालत ने फैमिली कोर्ट के मूल आदेश को बहाल करते हुए पिता को दोनों बेटियों के लिए कुल 60,000 रुपये प्रति माह का भरण-पोषण देने का निर्देश दिया।
मामले का बैकग्राउंड
पति-पत्नी का विवाह 18 जून 2006 को हुआ था। वैवाहिक जीवन के दौरान उनकी दो बेटियां हुईं, जिनकी उम्र वर्तमान में लगभग 9 और 8 वर्ष है। इस दौरान एक बेटे का भी जन्म हुआ था, जिसका जन्म के तुरंत बाद निधन हो गया। वैवाहिक विवाद और कड़वाहट बढ़ने के बाद पत्नी अपनी दोनों बेटियों के साथ ससुराल छोड़कर अलग रहने लगी।
वर्ष 2022 में, पत्नी और दोनों नाबालिग बेटियों ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत याचिका दायर कर प्रति माह 2,50,000 रुपये के भरण-पोषण की मांग की।
याचिकाकर्ता मां एमबीबीएस और डीजीओ (M.B.B.S., D.G.O.) योग्यता प्राप्त स्त्री रोग विशेषज्ञ (गाइनेकोलॉजिस्ट) हैं और ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में कार्यरत हैं, जहां उनकी मासिक आय 1,50,000 रुपये है। वहीं, पिता एमबीबीएस और एमडी (M.B.B.S., M.D.) योग्य बाल रोग विशेषज्ञ (पीडियाट्रिशियन) हैं, जो एक चिल्ड्रेन नर्सिंग होम में कंसल्टेंट के रूप में कार्यरत हैं और उनकी मासिक आय 2,00,000 रुपये है। हालांकि, पत्नी का दावा है कि पति का अपना नर्सिंग होम है।
21 अक्टूबर 2024 को फैमिली कोर्ट ने पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया था। फैमिली कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि दोनों पक्ष पर्याप्त कमाई कर रहे हैं और धारा 125 CrPC का उद्देश्य किसी पक्ष को बेरोजगारी या तत्काल दैनिक जरूरतों को पूरा करने में असमर्थता से बचाना है। हालांकि, यह देखते हुए कि मां दोनों बेटियों की शिक्षा और परवरिश का खर्च उठा रही है, फैमिली कोर्ट ने वयस्क होने तक प्रत्येक बेटी के लिए 30,000 रुपये प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण तय किया था।
इसके बाद पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 9 फरवरी 2026 के अपने आदेश में यह तो माना कि बच्चों के लिए 60,000 रुपये प्रति माह की राशि पर्याप्त है, लेकिन यह रुख अपनाया कि इसका पूरा बोझ अकेले पिता पर नहीं डाला जा सकता। हाईकोर्ट ने राशि को आधा करते हुए प्रत्येक बेटी के लिए भरण-पोषण घटाकर 15,000 रुपये प्रति माह कर दिया। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।
पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने बच्चों की छोटी उम्र और उनकी जरूरतों को स्वीकार करने के बावजूद भरण-पोषण की राशि घटाकर गलती की है। यह दलील दी गई कि दो बेटियों की शिक्षा और लालन-पालन का खर्च केवल मां की आय से पूरा नहीं किया जा सकता। साथ ही, यह भी कहा गया कि पिता की वास्तविक आय 2,00,000 रुपये प्रति माह से कहीं अधिक है।
दूसरी ओर, पति के वकील ने हाईकोर्ट के आदेश का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की होती है। चूंकि पत्नी खुद गाएनेकोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत है और प्रति माह 1,50,000 रुपये कमाती है, इसलिए वह भी खर्च उठाने में समान रूप से सक्षम है और फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि अत्यधिक थी।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के तर्क को अमान्य करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई अन्य कारण नहीं दिया, सिवाय इसके कि पत्नी भी कमा रही है। हाईकोर्ट ने न तो फैमिली कोर्ट के आकलन को गलत पाया था और न ही 60,000 रुपये प्रति माह की राशि को अत्यधिक माना था।
मां द्वारा बच्चों की दैनिक जरूरतों की देखभाल के गैर-मौद्रिक योगदान पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“केवल याचिकाकर्ता-पत्नी का कमाना, अपने आप में पिता की जिम्मेदारी को आधा करने का कारण नहीं है। बच्चों के भरण-पोषण का दायित्व दोनों माता-पिता द्वारा साझा किया जाता है, लेकिन इसे केवल गणित के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता। बेटियां याचिकाकर्ता-पत्नी के साथ रहती हैं, जो काम करने के साथ-साथ उनकी दैनिक जरूरतों और परवरिश की देखभाल भी करती हैं। ऐसी देखभाल को पैसे में नहीं मापा जा सकता, लेकिन यह एक वास्तविक योगदान है, और अक्सर यह बड़ा योगदान होता है।”
पिता की वित्तीय क्षमता और नाबालिग बेटियों की जरूरतों का जिक्र करते हुए अदालत ने आगे कहा:
“यदि पत्नी की कमाई को अलग भी रख दिया जाए, तब भी यह कटौती टिक नहीं सकती। प्रतिवादी-पति एक योग्य डॉक्टर है और अपने खुद के विवरण के अनुसार 2,00,000 रुपये (दो लाख रुपये) प्रति माह कमाता है। लगभग नौ और आठ साल की दो स्कूली बेटियों के लिए, उसकी स्थिति वाले पिता के लिए 60,000 रुपये (साठ हजार रुपये) प्रति माह की राशि कोई बड़ी रकम नहीं है। उनके पालन-पोषण और शिक्षा के लिए इतनी राशि की आवश्यकता है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 9 फरवरी 2026 के आदेश को रद्द करते हुए 21 अक्टूबर 2024 के फैमिली कोर्ट के आदेश को बहाल कर दिया। अदालत ने पिता को निर्देश दिया कि यदि कोई बकाया राशि (अरियर्स) है, तो उसका भुगतान तीन महीने के भीतर किया जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह मामला केवल अंतरिम भरण-पोषण से संबंधित है, इसलिए धारा 125 CrPC के तहत मुख्य याचिका पर फैमिली कोर्ट इन अंतरिम आदेशों की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना गुण-दोष के आधार पर फैसला करेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सुजाता कुमारी और अन्य बनाम राहुल कुमार और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2215/2026
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता
निर्णय की तिथि: 20 अगस्त 2026

