शक्तियों के बंटवारे के तहत अदालतों को नीति या कानून बनाने के निर्देश देने में सावधानी बरतनी चाहिए: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पंचायत कर्मचारियों की पेंशन याचिका खारिज की

संविधान के तहत शक्तियों के बंटवारे को रेखांकित करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अदालतें विधायिका या कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में दखल देकर कोई नीति या कानून बनाने का निर्देश जारी नहीं कर सकती हैं। जस्टिस बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने सेवानिवृत्त जनपद पंचायत कर्मचारियों की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें मासिक पेंशन की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने माना कि संबंधित नियमों के अभाव में पंचायत कर्मचारियों को पेंशन पाने का कोई कानूनी या वैधानिक अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल सरकार को ऐसी नीति लागू करने के लिए बाध्य करने हेतु नहीं किया जा सकता, जो स्वायत्त संस्थाओं के उन कर्मचारियों को पेंशन दे जो पहले से भविष्य निधि (कंट्रीब्यूटरी प्रॉविडेंट फंड यानी सीपीएफ) प्रणाली के तहत आते हैं।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला उर्मिला पाणिग्रही सहित कई अन्य सेवानिवृत्त जनपद पंचायत कर्मचारियों द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के निदेशक द्वारा 21 जुलाई 2025 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनकी पेंशन संबंधी मांगों और अभ्यावेदनों को खारिज कर दिया गया था।

याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 के लागू होने से पहले बस्तर, दंतेवाड़ा, रायगढ़, बीजापुर, मुंगेली, बिलासपुर, धमतरी, सक्ती, कांकेर, दुर्ग, सुकमा और कोरबा जैसे विभिन्न जिलों की जनपद पंचायतों में हुई थी। लंबी सेवा पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुए इन कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर विभाग के खारिज करने वाले आदेश को रद्द करने और उन्हें नियमित मासिक पेंशन जारी करने के लिए परमादेश (मैंडमस) देने की मांग की थी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि कर्मचारियों ने लंबी, बेदाग और अर्हक सेवा पूरी की है और वे नियमों के अनुरूप ही सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने दलील दी कि छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 131 एक रक्षक प्रावधान (सेविंग क्लॉज) है, जो कानून लागू होने के समय सेवा में मौजूद स्थाई कर्मचारियों के वेतन, भत्तों, पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों को सुरक्षित रखता है। इसलिए अधिनियम लागू होने से पहले नियुक्त होने के कारण वे पेंशन पाने के हकदार हैं।

याचिकाकर्ताओं ने भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि बालोद जिले की जनपद पंचायत गुंडरदेही में इसी तरह के कर्मचारियों को मासिक पेंशन दी जा रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ और जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत कर्मचारी संघ बनाम मध्य प्रदेश राज्य के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पेंशन एक अर्जित अधिकार है और संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत संपत्ति के अधिकार जैसा है, जिसे मनमाने ढंग से नहीं छीना जा सकता।

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वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने याचिकाओं का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता स्वायत्त जनपद पंचायतों के कर्मचारी हैं, न कि राज्य के मामलों से जुड़े किसी सिविल सेवा या पद पर नियुक्त सरकारी सेवक। इसलिए उन पर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 लागू नहीं होते। उन्होंने बताया कि न तो 1993 के अधिनियम में और न ही पंचायत सेवा (भर्ती और सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1999 में पंचायत कर्मचारियों के लिए पेंशन का कोई प्रावधान रखा गया है।

राज्य सरकार ने अपने हलफनामे का हवाला देते हुए बताया कि मध्य प्रदेश जनपद पंचायत कर्मचारी (योग्यता, भर्ती और सेवा शर्तें) नियम, 1976 के नियम 40 (मध्य प्रदेश पंचायत अधिनियम, 1962 की धारा 147 के साथ पठित) के तहत कर्मचारी भविष्य निधि योजना के हकदार थे। याचिकाकर्ताओं को अंशदायी भविष्य निधि (सीपीएफ) का लाभ मिला है, और 1976 के पेंशन नियमों के नियम 2(2)(डी) के तहत सीपीएफ पाने वालों पर पेंशन नियम लागू नहीं होते।

गुंडरदेही पंचायत में पेंशन मिलने की दलील का जवाब देते हुए सरकार ने स्पष्ट किया कि गुंडरदेही में तीन और तखतपुर जनपद पंचायत में तीन कर्मचारियों को सामान्य प्रशासन समिति के स्थानीय प्रस्ताव के जरिए बनाए गए फंड से पेंशन दी जा रही थी, न कि किसी वैधानिक नियम के तहत। पंचायत विभाग ने इस संबंध में 27 अगस्त 2026 और 31 अगस्त 2026 को संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। सरकार ने दलील दी कि किसी अवैधता या गैर-कानूनी प्रक्रिया के आधार पर समानता के अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट का विश्लेषण: शक्ति पृथक्करण और वैधानिक सीमाएं

अदालत ने इस मूल प्रश्न पर विचार किया कि क्या पंचायत सेवा से सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पास पेंशन का कोई प्रवर्तनीय वैधानिक अधिकार है। जस्टिस गुरु ने संविधान में शक्तियों के बंटवारे की सीमाओं पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट के हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम सतपाल सैनी, सुप्रीम कोर्ट एम्प्लॉईज वेलफेयर एसोसिएशन बनाम भारत संघ और जम्मू-कश्मीर राज्य बनाम ए.आर. जक्की के निर्णयों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा के जरिए विधायिका को कोई कानून बनाने या कार्यपालिका को अधीनस्थ कानून या नियम तैयार करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के वी.के. नसवा बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए रेखांकित किया:

“18. इस प्रकार, यह पूरी तरह स्पष्ट है कि अदालत की भूमिका बहुत सीमित है और इसके दायरे में रहते हुए न्यायिक कानून निर्माण की अनुमति नहीं है। न तो अदालत कानून बना सकती है, और न ही उसके पास विधायिका को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश देने की कोई सक्षमता है।”

निर्णय के मुख्य बिंदु (हेडनोट) को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत यह अनिवार्य करता है कि कार्यपालिका को कोई विशेष नीति अपनाने या विधायिका को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश देते समय अदालतें पूरी तरह सतर्क और संयमित रहें।”

अदालत ने कहा कि न्यायपालिका सरकार के तीन समान अंगों में से एक है। नीतियां बनाने का काम कार्यपालिका का है जो विधायिका और जनता के प्रति जवाबदेह होती है। यदि संबंधित वैधानिक नियमों में कोई लाभ नहीं दिया गया है, तो अदालत केवल इसलिए वह लाभ देने का आदेश नहीं दे सकती कि वह वांछनीय लगता है।

अधिनियम की धारा 131 की व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि यह प्रावधान केवल पहले से मौजूद अधिकारों को बचाने के लिए है; यह ऐसा कोई नया अधिकार नहीं देता जो सेवा शर्तों में पहले से मौजूद ही न हो। संविधान के अनुच्छेद 300-ए और सुप्रीम कोर्ट के झारखंड राज्य बनाम जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव मामले पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पेंशन संपत्ति का अधिकार तभी मानी जाती है जब कानून के तहत उसका कोई पूर्व-मौजूदा अधिकार हो।

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पंचायत कर्मचारियों की विधिक स्थिति पर हाईकोर्ट ने अपनी समन्वय पीठ के फैसलों (हेमराज निषाद बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और ओम प्रकाश परही बनाम छत्तीसगढ़ राज्य) तथा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले (बलीराम खेडेकर बनाम पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग) का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ सार्वजनिक दायित्व निभा लेने से कोई व्यक्ति सरकारी सेवक नहीं बन जाता:

“यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि पंचायत कर्मचारी सरकारी सेवक नहीं हैं। पंचायत संस्थाएं स्वायत्त निकाय हैं और उनके कर्मचारी अलग भर्ती एवं सेवा नियमों से शासित होते हैं। केवल इसलिए कि कोई पंचायत कर्मचारी सार्वजनिक कार्य करता है, वह सरकारी सेवक नहीं बन जाता। याचिकाकर्ता पंचायत सेवा में कार्यरत रहे, उन्होंने पंचायत निधि से वेतन प्राप्त किया और वे पंचायत नियमों से शासित थे। इसलिए, यह दावा कि उन्हें पेंशन का लाभ दिया जाना चाहिए, कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी माना कि कुछ अन्य पंचायतों में स्थानीय प्रस्ताव से दी जा रही पेंशन याचिकाकर्ताओं को कोई कानूनी अधिकार नहीं देती:

“किसी एक प्राधिकारी द्वारा दिया गया कोई गलत या विवादित लाभ, मौजूदा वैधानिक ढांचे के विपरीत परमादेश जारी करने का आधार नहीं बन सकता।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता पेंशन पाने का कोई भी वैधानिक अधिकार साबित करने में पूरी तरह विफल रहे हैं और विभाग द्वारा उनकी मांगों को खारिज करने का आदेश कानूनी रूप से सही है। अदालत ने इस बैच की सभी रिट याचिकाओं को सारहीन पाते हुए खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: उर्मिला पाणिग्रही बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य (तथा अन्य संबद्ध मामले)

वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 11820 वर्ष 2025 एवं अन्य संबद्ध मामले

पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु

निर्णय की तिथि: 05 अक्टूबर, 2026

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