सह्याद्री टाइगर रिजर्व: स्कूली बच्चों को सुरक्षा न देने पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, महाराष्ट्र शासन से मांगा जवाब

सह्याद्री टाइगर रिजर्व (एसटीआर) के वन्यजीव प्रभावित क्षेत्रों में स्थित स्कूलों में पढ़ने वाले 228 बच्चों को सुरक्षित परिवहन सुविधा उपलब्ध न कराने पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और स्थानीय प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने चार महीने पुराने अदालती आदेश का पालन न करने पर कोल्हापुर के जिला कलेक्टर और वन विभाग से एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर कर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।

हाईकोर्ट की कोल्हापुर सर्किट बेंच में जस्टिस शर्मिला यू. देशमुख और जस्टिस नीरज पी. ढोटे की पीठ ने 19 अगस्त 2026 को इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर सरकारी तंत्र का रवैया बेहद निराशाजनक और चिंताजनक है। पीठ ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारी संतोषजनक जवाब देने में विफल रहे, तो अदालत उनके खिलाफ सख्त न्यायिक कदम उठाने के लिए बाध्य होगी।

प्रशासन की लापरवाही पर हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी

यह मामला हरीश भीमराव कांबले द्वारा दायर जनहित याचिका, मध्यस्थता आवेदन और अवमानना याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता द्वारा 19 अगस्त को दायर एक अतिरिक्त हलफनामे में अदालत को बताया गया कि आठ गांवों के 228 छात्र रोजाना पांच अलग-अलग स्कूलों में जाने के लिए वन्यजीवों के हमलों का जोखिम उठाने को मजबूर हैं।

सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि 2 अप्रैल 2026 को दिए गए स्पष्ट आदेश के बावजूद जिला कलेक्टर और वन विभाग ने खतरनाक क्षेत्रों में स्थित स्कूलों की पहचान करने या रैपिड रिस्पॉन्स टीम (आरआरटी) की निगरानी में सुरक्षित बस सेवा शुरू करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। चार महीने बीत जाने के बाद भी अधिकारियों ने अदालत में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल नहीं की। हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 25 अगस्त तय की है।

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रोजाना 30 किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर मासूम

अदालत में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में सार्वजनिक या स्कूली बस सुविधा बिल्कुल नहीं है। इस कारण कक्षा 6 का एक छात्र पढ़ाई करने के लिए रोजाना चार घंटे पैदल चलकर लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय करता है।

अदालत ने कहा कि दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले मासूम बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा को लेकर जिला प्रशासन पूरी तरह से बेपरवाह बना हुआ है। पीठ ने कहा कि अप्रैल में पारित आदेश को अधिकारियों ने अपनी सुविधा के अनुसार अनदेखा कर दिया, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता की मांगें और कानूनी प्रावधान

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याचिका में मांग की गई है कि संवेदनशील स्कूलों के आसपास सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक रैपिड रिस्पॉन्स टीम (आरआरटी) को स्थायी रूप से तैनात किया जाए। इसके अलावा, शिट्टूर-वारुण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस की स्थायी तैनाती का अनुरोध भी किया गया है।

याचिकाकर्ता ने शिक्षा का अधिकार (आरटीई) नियमों के नियम 6 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि बच्चों के लिए स्कूल तक सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करना राज्य सरकार का वैधानिक दायित्व है। इसके साथ ही, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 38वी और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि नागरिकों की सुरक्षा और वन्यजीवों का संरक्षण करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

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