AYUSH डॉक्टरों को ‘पंजीकृत चिकित्सा विशेषज्ञ’ घोषित करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, 1954 की औषधि विज्ञापन कानून की समीक्षा की भी मांग


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार की विधि, स्वास्थ्य और आयुष मंत्रालयों से उस जनहित याचिका (PIL) पर जवाब तलब किया है, जिसमें AYUSH डॉक्टरों को एलोपैथिक डॉक्टरों की तरह ‘पंजीकृत चिकित्सा विशेषज्ञ’ (Registered Medical Practitioners) के रूप में मान्यता देने की मांग की गई है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह नोटिस कानून के छात्र नितिन उपाध्याय की याचिका पर जारी किया, जो वरिष्ठ वकील और उनके पिता अश्विनी उपाध्याय के माध्यम से अदालत में पेश हुए थे। याचिका में यह भी आग्रह किया गया है कि केंद्र सरकार एक विशेषज्ञ समिति का गठन करे जो ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 की अनुसूची की वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समीक्षा और अद्यतन करे।

सुनवाई के दौरान कोर्ट में दिलचस्प संवाद भी देखने को मिला। CJI ने पूछा, “ये आपके बेटे हैं?”
अश्विनी उपाध्याय ने जवाब दिया, “जी हां।”
इस पर CJI ने मुस्कुराते हुए टिप्पणी की, “हमें लगा था कि यह कोई गोल्ड मेडल जीतेगा, लेकिन ये PIL दाखिल कर रहे हैं। पढ़ाई क्यों नहीं करते?… नोटिस जारी करें। सिर्फ आपके बेटे के लिए। ताकि ये अच्छी तरह पढ़ाई करें।”

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याचिका में कहा गया है कि ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट, 1954 की धारा 2 (cc) के तहत “पंजीकृत चिकित्सा विशेषज्ञ” की परिभाषा में AYUSH डॉक्टरों को शामिल नहीं किया गया है, जबकि वे भी भारत में विधिवत रूप से पंजीकृत होते हैं और चिकित्सा सेवा दे रहे हैं।

धारा 3(d) के तहत कुछ गंभीर बीमारियों के इलाज से संबंधित दवाओं के विज्ञापन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह प्रावधान सभी प्रकार के विज्ञापनों पर बिना भेदभाव के प्रतिबंध लगाता है, चाहे वे वैज्ञानिक और प्रमाणित हों या भ्रामक।

याचिका के प्रमुख तर्क:

  • AYUSH डॉक्टरों को भी धारा 14 के तहत दिए गए अपवादों में शामिल किया जाए ताकि वे अपने इलाज के बारे में तथ्यात्मक जानकारी साझा कर सकें।
  • केवल भ्रामक विज्ञापनों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, न कि सभी गैर-एलोपैथिक विज्ञापनों को।
  • जनता को जीवन रक्षक और गंभीर बीमारियों की रोकथाम व इलाज के लिए वैज्ञानिक जानकारी पाने का अधिकार है।
  • 1954 का कानून अब पुराना हो चुका है और इसकी अनुसूची को अद्यतन किए जाने की आवश्यकता है ताकि वर्तमान चिकित्सा वैज्ञानिक प्रगति को ध्यान में रखा जा सके।
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याचिका में मांग की गई है कि केंद्र सरकार एक विशेषज्ञ समिति गठित करे जो इस अधिनियम की अनुसूची की वैज्ञानिक समीक्षा कर उसे आधुनिक संदर्भ में संशोधित करे।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित मंत्रालयों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया है।

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