सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीताांजलि जे अंगमो द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की, जिसमें वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हुई गिरफ्तारी को चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई अधूरी रही और अब यह 12 जनवरी को फिर से जारी रहेगी।
अंगमो की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि वांगचुक के भाषण को हिंसा भड़काने के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया, जबकि असल में उन्होंने हिंसा रोकने की अपील की थी।
सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ—न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले—के समक्ष वांगचुक का एक वीडियो चलाया, जिसमें उन्होंने भूख हड़ताल तोड़ते समय कहा था:
“मैं इस हिंसा को स्वीकार नहीं करता। हमें इस हिंसा को रोकना चाहिए। मैं आप सभी से अपील करता हूं कि हिंसा न करें।”
सिब्बल ने कहा कि वांगचुक की यह अपील ठीक वैसी ही थी जैसी महात्मा गांधी ने चौरी-चौरा कांड के बाद हिंसा के विरोध में दी थी। उन्होंने जोर दिया कि वांगचुक का भाषण राज्य की सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं था और न ही उसमें किसी प्रकार की हिंसा को बढ़ावा देने की बात कही गई।
सिब्बल ने कहा कि जिन चार वीडियो को प्रशासन ने वांगचुक की नजरबंदी का आधार बताया—दिनांक 10, 11 और 24 सितंबर, 2025 के—उन्हें वांगचुक को कभी सौंपा ही नहीं गया। उन्होंने कहा कि 29 सितंबर को जो पेन ड्राइव दी गई, उसमें ये वीडियो शामिल नहीं थे। इसके अलावा, नजरबंदी के आधार भी 28 दिन की देरी से प्रदान किए गए, जो संविधान के अनुच्छेद 22 का स्पष्ट उल्लंघन है।
अनुच्छेद 22 के तहत किसी भी नजरबंद व्यक्ति को जल्द से जल्द उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जानकारी दी जानी चाहिए और उसे उचित प्रतिनिधित्व का अवसर मिलना चाहिए।
सिब्बल ने कहा कि नजरबंदी के आधारों और संबंधित दस्तावेजों की गैर-प्राप्ति, व्यक्ति को प्रभावी जवाब देने के अधिकार से वंचित करती है, जिससे पूरी कार्रवाई अवैध हो जाती है।
लेह जिला मजिस्ट्रेट ने पहले दायर किए गए हलफनामे में कहा था कि वांगचुक को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लिया गया है और उनके साथ किसी प्रकार का दुर्व्यवहार नहीं हुआ है। प्रशासन ने दावा किया कि उन्हें सभी जरूरी दस्तावेज और नजरबंदी के आधार प्रदान कर दिए गए हैं।
प्रशासन का कहना है कि वांगचुक की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं के लिए खतरा थीं, इसलिए उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया।
सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था, जब लद्दाख में राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष दर्जे की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों में चार लोगों की मौत हुई और 90 से ज्यादा घायल हुए थे।
अंगमो ने याचिका में दावा किया कि 24 सितंबर को हुई हिंसा का वांगचुक से कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने कहा कि वांगचुक ने उस दिन को अपनी “तपस्या और शांतिपूर्ण संघर्ष के पांच सालों की सबसे दुखद घड़ी” बताया था और सोशल मीडिया के माध्यम से हिंसा की निंदा की थी।
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून केंद्र और राज्यों को किसी भी ऐसे व्यक्ति को अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखने की शक्ति देता है, जो देश की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा हो सकता है। हालांकि, यह हिरासत समय से पहले भी रद्द की जा सकती है।
अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 12 जनवरी को करेगा।

