‘न्याय का उपहास’: सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार मामलों में FIR रद्द करने के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को किया रद्द, आगे चुनौतियों पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें भ्रष्टाचार के कई मामलों में दर्ज एफआईआर को निरस्त कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के रुख को “न्याय का उपहास” बताया और कहा कि हाईकोर्ट अब इन मामलों में FIR या जांच को लेकर कोई और याचिका स्वीकार नहीं करेगा।

न्यायमूर्ति एम एम सुंद्रेश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने आंध्र प्रदेश की एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और अन्य द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के अगस्त 2023 के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें 2016 से 2020 के बीच विजयवाड़ा स्थित ACB की केंद्रीय जांच इकाई द्वारा दर्ज एफआईआर रद्द कर दी गई थीं।

हाईकोर्ट ने इन एफआईआर को इस आधार पर रद्द कर दिया था कि जहां पर ये दर्ज की गईं, वह ACB का कार्यालय पुलिस स्टेशन के रूप में अधिसूचित नहीं था, जैसा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 2(स) में परिभाषित है।

हाईकोर्ट ने कहा था कि चूंकि विजयवाड़ा स्थित ACB केंद्रीय जांच इकाई को औपचारिक रूप से “पुलिस स्टेशन” के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया, इसलिए उसे एफआईआर दर्ज करने का अधिकार नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले की आलोचना करते हुए कहा:

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“हमारे विचार में हाईकोर्ट का रुख न्याय का उपहास है। यदि एफआईआर को एक अत्यधिक तकनीकी आधार पर रद्द किया जाता है, तो हाईकोर्ट की जिम्मेदारी बनती है कि वह क्षेत्राधिकार संबंधी कानून स्पष्ट रूप से बताए।”

शीर्ष अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 2(स) में पुलिस स्टेशन की अधिसूचना की आवश्यकता को भावना और उद्देश्य के साथ देखा जाना चाहिए, न कि केवल औपचारिकता के रूप में।

कोर्ट ने 2022 में जारी एक सरकारी आदेश का उल्लेख किया, जिसमें आंध्र प्रदेश में ACB की केंद्रीय जांच इकाई, विजयवाड़ा के संयुक्त निदेशक के कार्यालय को पूरे राज्य के लिए पुलिस स्टेशन घोषित किया गया था।

“हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष कि 2022 का स्पष्ट करने वाला सरकारी आदेश पहले दर्ज एफआईआर को प्रभावित नहीं करेगा, पूरी तरह से गलत और विधि के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है,” सुप्रीम कोर्ट ने कहा।

“जब कोई सरकारी आदेश स्पष्टीकरण के रूप में जारी किया जाता है, तो उसे प्रतिपादित (retrospective) मानने का कोई सवाल ही नहीं उठता।”

कोर्ट ने यह भी कहा:

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“हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने के लिए अनावश्यक प्रयास किए।”

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया:

“हम हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने में कोई हिचकिचाहट नहीं रखते… आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट अब इन एफआईआर को चुनौती देने वाली कोई और याचिका स्वीकार नहीं करेगा।”

  • ACB को इन मामलों की जांच जारी रखने की अनुमति दी गई है।
  • जहां आरोपपत्र दाखिल हो चुके हैं या होंगे, वहां संबंधित व्यक्ति उन्हें अन्य कानूनी आधारों पर चुनौती दे सकते हैं।
  • जिन मामलों में जांच अभी लंबित है, वहां सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि ACB कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करे, और आरोपी पूरा सहयोग करें।
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यह फैसला न केवल कई भ्रष्टाचार मामलों की जांच का रास्ता साफ करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि तकनीकी आधार पर गंभीर मामलों को दरकिनार नहीं किया जा सकता और राज्य की भ्रष्टाचार-रोधी एजेंसियों को अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

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