नव केरल सिटिजन रिस्पॉन्स प्रोग्राम के लिए ₹20 करोड़ की स्वीकृति रद्द करने वाले केरल हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक; राज्य की अपील पर नोटिस जारी

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केरल हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें नव केरल सिटिजन रिस्पॉन्स प्रोग्राम के लिए ₹20 करोड़ की स्वीकृति देने वाले राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया गया था। शीर्ष अदालत के इस आदेश से फिलहाल योजना के जारी रहने का रास्ता साफ हो गया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं सहित प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया।

राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि इस योजना के तहत CPI(M) कार्यकर्ताओं को “एक पैसा भी” नहीं दिया गया है।

पीठ ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि यदि राज्य सरकार जमीनी स्तर पर कल्याणकारी योजनाओं के प्रभाव का आकलन करने के लिए सरकारी कर्मचारियों की मदद लेती है तो इसमें कोई गलत बात नहीं है।

प्रतिवादियों के वकील ने आरोप लगाया कि यह कार्यक्रम चुनाव से पहले जनसंपर्क अभियान के रूप में चलाया जा रहा है और इसमें सरकारी कर्मचारियों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं का उपयोग किया जा रहा है।

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केरल हाईकोर्ट ने 17 फरवरी को राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को ₹20 करोड़ खर्च करने की अनुमति दी गई थी। हाईकोर्ट ने इसे “कार्यपालिका की रंगीन शक्ति का प्रयोग” (colourable exercise of executive power) बताते हुए कहा था कि यह रूल्स ऑफ बिजनेस का उल्लंघन है।

मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी कहा था कि विभागों को दिए गए बजटीय आवंटन का “सख्ती से पालन नहीं किया जा रहा” और वित्तीय अनुशासन लागू करने के लिए बनाए गए नियमों को “तेजी से दरकिनार किया जा रहा है”।

हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया था कि CPI(M) के राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन द्वारा पार्टी संबद्ध संगठनों को इस कार्यक्रम में भाग लेने और सोशल वॉलंटियर फोर्स पोर्टल पर पंजीकरण करने का आह्वान करने वाला पत्र, कैबिनेट के निर्णय और सरकारी आदेश से पहले जारी हो गया था, जिसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

यह आदेश कोच्चि निवासी मुबास एम.एच. और केरल स्टूडेंट्स यूनियन (KSU) के प्रदेश अध्यक्ष अलोशियस जेवियर द्वारा दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए पारित किया गया था। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि सार्वजनिक धन का उपयोग सत्तारूढ़ मोर्चे के राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि यह कार्यक्रम पहले कभी नहीं चलाया गया और इसे विधानसभा चुनाव की घोषणा के करीब शुरू किया गया।

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अदालत ने पाया कि ₹20 करोड़ के उपयोग की स्वीकृति देने वाला आदेश रूल्स ऑफ एलोकेशन ऑफ बिजनेस और संबंधित बजटीय प्रावधानों के उल्लंघन के कारण “मूलतः त्रुटिपूर्ण और अस्थिर” है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए योजना को फिलहाल जारी रखने की अनुमति दी है और प्रतिवादियों से जवाब मांगा है। मामले की आगे सुनवाई प्रतिवादियों के उत्तर दाखिल करने के बाद होगी।

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