सिविल सेवा में पूर्व सैनिकों के वेतन निर्धारण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख, कहा- पहले संबंधित अधिकारियों के पास जाएं

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उन पूर्व सैनिकों की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिन्होंने मौजूदा वेतन-निर्धारण (Pay-fixation) नियमों की वैधता को चुनौती दी थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि वर्तमान ढांचा उन सैन्य दिग्गजों को अनुचित रूप से दंडित करता है जो अपनी सेवानिवृत्ति के बाद सिविल सेवाओं में शामिल होते हैं।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। हालांकि कोर्ट ने इस स्तर पर याचिका पर सुनवाई नहीं की, लेकिन याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने (Representation) की छूट दी है, जो इस पर जल्द से जल्द निर्णय लेंगे।

यह याचिका बैद्य नाथ चौधरी और पांच अन्य द्वारा दायर की गई थी। इसमें मुख्य रूप से केंद्रीय सिविल सेवा (संशोधित वेतन) नियम, 2016 के नियम 8 और 1 मई, 2017 के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के एक ज्ञापन को चुनौती दी गई थी।

सभी याचिकाकर्ता पूर्व में ‘पर्सनल बिलो ऑफिसर रैंक’ (PBORs) के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं और वर्तमान में आयकर विभाग और भारतीय खाद्य निगम (FCI) जैसे विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत हैं। उनका तर्क है कि मौजूदा नियम उन्हें अपने नए पदों के “न्यूनतम वेतन स्तर” से शुरू करने के लिए मजबूर करते हैं, जो उनके साथ अन्याय है।

याचिका के अनुसार, यह “मैकेनिकल फिक्सेशन” सेना, नौसेना या वायु सेना में उनके दशकों के सैन्य अनुभव और उनके द्वारा प्राप्त अंतिम वेतन की पूरी तरह से अनदेखी करता है।

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एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड अश्वनी दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में तर्क दिया गया कि 15 से 20 साल के अनुभव वाले दिग्गजों को “नए रंगरूटों” (Fresh Entrants) के समान मानना समानता के अधिकार यानी अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

पूर्व सैनिकों ने इसे “शत्रुतापूर्ण भेदभाव” (Hostile Discrimination) बताते हुए कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अक्सर पुनर्रोजगार पाने वाले दिग्गजों को वेतन सुरक्षा (Pay Protection) प्रदान करते हैं, जबकि अन्य सरकारी विभाग ऐसा नहीं करते। इसके कारण कई बार उनकी नई कुल आय, सक्रिय रक्षा सेवा के दौरान मिलने वाले वेतन से भी कम हो जाती है।

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सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को पहले प्रशासनिक उपायों का लाभ उठाना चाहिए। कोर्ट ने वकील अश्विनी उपाध्याय को अधिकारियों को अपना प्रतिनिधित्व सौंपने की अनुमति दी और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे इस पर यथाशीघ्र फैसला लें।

बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता अधिकारियों के निर्णय से असंतुष्ट रहते हैं, तो वे अपनी शिकायतों के समाधान के लिए केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

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