लोन चुकाने की प्रतिबद्धता पत्नी को मेंटेनेंस देने के कानूनी दायित्व से ऊपर नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता बढ़ाकर ₹25,000 किया

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पति की वित्तीय प्रतिबद्धताएं, जैसे कि संपत्ति निर्माण के लिए लोन की अदायगी, पत्नी को गुजारा भत्ता देने के उसके प्राथमिक कानूनी दायित्व को कम नहीं कर सकतीं। मेंटेनेंस में वृद्धि की मांग वाली एक अपील पर सुनवाई करते हुए, कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन किया और मासिक गुजारा भत्ते की राशि को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 कर दिया।

कानूनी मुद्दा

मामले में मुख्य विचारणीय विषय यह था कि क्या पति की सैलरी से होने वाली स्वैच्छिक कटौतियां, विशेष रूप से वे जो संपत्ति बनाने या लोन चुकाने के उद्देश्य से की गई हों, उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत जीवनसाथी के भरण-पोषण के वैधानिक दायित्व से अधिक प्राथमिकता दी जा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता और प्रतिवादी का विवाह 7 मई 2023 को नई दिल्ली में हुआ था। शादी के एक साल के भीतर ही, उपेक्षा और शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना के आरोपों के बीच अपीलकर्ता ने ससुराल छोड़ दिया। तब से वह अपने माता-पिता के घर पर रह रही है और उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है।

18 सितंबर 2024 को अपीलकर्ता ने टनकपुर की सक्षम अदालत में BNSS की धारा 144 के तहत कार्यवाही शुरू की थी। फैमिली कोर्ट, चंपावत ने पति की सैलरी और उसमें हो रही कटौतियों को ध्यान में रखते हुए 25 फरवरी 2025 को ₹8,000 प्रति माह का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। पुनरीक्षण (Revision) पर, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस राशि को बढ़ाकर ₹15,000 प्रति माह कर दिया। इस राशि से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता: अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ₹15,000 की राशि “बेहद अपर्याप्त” है और प्रतिवादी की वास्तविक कमाई को नहीं दर्शाती। यह दलील दी गई कि निचली अदालतों ने प्रतिवादी की सैलरी में होने वाली कटौतियों पर “अनुचित भरोसा” किया है। अपीलकर्ता के अनुसार, ये कटौतियां स्वैच्छिक प्रकृति की हैं और संपत्ति निर्माण से संबंधित हैं, इसलिए इन्हें प्रतिवादी के प्राथमिक दायित्व को “कम” करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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प्रतिवादी: प्रतिवादी के वकील ने कहा कि हाईकोर्ट पहले ही साक्ष्यों पर विचार करने के बाद मेंटेनेंस बढ़ा चुका है और अब इसमें किसी और हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि वित्तीय देनदारियों और कटौतियों के कारण प्रतिवादी की “वास्तविक खर्च करने योग्य आय” (disposable income) काफी कम हो गई है और दी गई राशि उचित है।

कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अवलोकन किया कि मेंटेनेंस का उद्देश्य बेसहारा होने से रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी गरिमा के साथ रह सके। कोर्ट ने चतुर्भुज बनाम सीता बाई, शमीमा फारूकी बनाम शाहिद खान और रजनीश बनाम नेहा के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख किया।

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अदालत ने पाया कि प्रतिवादी केनरा बैंक में मैनेजर है और उसकी ग्रॉस मासिक आय ₹1,15,670 है। सैलरी कटौतियों की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:

“वित्तीय प्रतिबद्धताओं जैसे कि लोन की अदायगी से उत्पन्न होने वाली कटौतियां, विशेष रूप से जहां वे संपत्ति के निर्माण में योगदान करती हैं, उन्हें आवश्यक खर्चों के समान नहीं माना जा सकता ताकि मेंटेनेंस के दायित्व को काफी हद तक कम किया जा सके।”

पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि ऐसी किस्तें “पूंजी निवेश” का हिस्सा हैं, न कि “अनिवार्य या अपरिहार्य व्यय”। फैसले में जोर दिया गया:

“पत्नी का भरण-पोषण करना पति का प्राथमिक और निरंतर कर्तव्य है… संपत्ति बनाने वाली किस्तों के आधार पर होने वाली कटौतियों को मेंटेनेंस निर्धारित करने के उद्देश्य से प्रतिवादी की वास्तविक कमाई क्षमता को कम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

अदालत का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को संशोधित करते हुए गुजारा भत्ते को बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह कर दिया, जो आवेदन की तिथि (18 सितंबर 2024) से प्रभावी होगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि कोई बकाया (Arrears) है, तो उसे तीन महीने के भीतर चुकाया जाए और मेंटेनेंस की राशि प्रत्येक कैलेंडर माह की 7 तारीख तक या उससे पहले दी जाए।

केस डिटेल्स
केस का शीर्षक: दीपा जोशी बनाम गौरव जोशी
केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या ___ ऑफ 2026 (अराइजिंग आउट ऑफ SLP (Crl.) नंबर 15662 ऑफ 2025)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

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