यूपी में 10 लाख से ज्यादा आर्म्स लाइसेंस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त; बाहुबलियों और अपराधियों को लेकर उठाए गंभीर सवाल

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में हथियारों के लाइसेंस के नियमन और ऑडिट को लेकर राज्य के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। शस्त्र ऑडिट से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कड़ी चेतावनी दी कि जिस समाज में हथियारों के बल पर धमकियां और वर्चस्व का प्रदर्शन होता है, वहां नागरिक शांति और सामाजिक सौहार्द कभी सुरक्षित नहीं रह सकता।

न्यायाधीश विनोद दिवाकर ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के जिला मजिस्ट्रेटों (DMs), पुलिस कमिश्नरों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों (SSPs) ने शस्त्र अधिनियम, 1959 और इस संबंध में समय-समय पर जारी सरकारी निर्देशों का “अक्षरशः” पालन नहीं किया है।

“वर्चस्व और डर का माहौल” — कोर्ट की गंभीर चिंता

हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए जस्टिस दिवाकर ने कहा कि हथियारों का प्रदर्शन सुरक्षा की झूठी भावना पैदा करता है, जबकि वास्तव में यह आम लोगों को डराने और दबाने का काम करता है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

“जिस समाज में सशस्त्र लोग दिखाई देने वाले बल और धमकियों के जरिए अपना वर्चस्व स्थापित करते हैं, वह समाज अधिक स्वतंत्र या शांतिपूर्ण नहीं बनता; बल्कि यह जनता के भरोसे को खत्म करता है, सुरक्षा की भावना को कमजोर करता है और नागरिक शांति को भंग करता है।”

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“हथियारों का सार्वजनिक प्रदर्शन वर्चस्व, ताकत और सुरक्षा का एक भ्रम पैदा कर सकता है, लेकिन यह अक्सर सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ता है और आम लोगों के मन में भय और असुरक्षा की भावना पैदा करता है।”

रसूखदारों की जानकारी छिपाने पर पुलिस पर बरसे कोर्ट

हाई कोर्ट ने इस बात पर बेहद नाराजगी जताई कि स्थानीय पुलिस प्रशासन ने राजनीतिक और सामाजिक रूप से प्रभावशाली लोगों के शस्त्र लाइसेंसों से जुड़ी जानकारी को पारदर्शी तरीके से कोर्ट के सामने नहीं रखा।

जस्टिस दिवाकर ने साफ तौर पर कहा कि स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने कुछ बेहद रसूखदार लोगों के बारे में महत्वपूर्ण विवरण छिपाने का काम किया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कुछ प्रमुख नामों का विशेष रूप से उल्लेख किया:

“स्थानीय पुलिस अधिकारी भारी सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव रखने वाले कुछ रसूखदार व्यक्तियों का विवरण देने में विफल रहे हैं, और ऐसे लोगों से संबंधित महत्वपूर्ण विवरण छिपाए गए हैं। इस सूची में बृजभूषण सिंह, रघुराज प्रताप सिंह, धनंजय सिंह, उपेंद्र सिंह गुड्डू और अन्य जैसे प्रभावशाली लोग शामिल हैं।”

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यूपी में शस्त्र लाइसेंस की हकीकत: चौंकाने वाले आंकड़े

कोर्ट ने गृह संयुक्त सचिव द्वारा 20 मई को दाखिल हलफनामे को प्रशासनिक लापरवाहियों का “स्पष्ट प्रमाण” बताया। पूर्व में अपर मुख्य सचिव (गृह) द्वारा कोर्ट को सौंपे गए आंकड़ों से उत्तर प्रदेश में हथियारों की स्थिति और प्रशासनिक सुस्ती की एक चिंताजनक तस्वीर सामने आती है:

  • कुल सक्रिय लाइसेंस: उत्तर प्रदेश में वर्तमान में कुल 10,08,953 शस्त्र लाइसेंस जारी किए जा चुके हैं।
  • लंबित आवेदन: अलग-अलग श्रेणियों के 23,407 आवेदन अभी भी विचार के लिए लंबित हैं।
  • लंबित अपीलें: जिला मजिस्ट्रेटों के फैसलों के खिलाफ क्षेत्रीय कमिश्नरों के पास 1,738 अपीलें पेंडिंग हैं।
  • एक से अधिक लाइसेंस: राज्य में 20,960 परिवार ऐसे हैं जिनके पास एक से अधिक शस्त्र लाइसेंस हैं।
  • अपराधी पृष्ठभूमि: राज्य में 6,062 ऐसे मामलों में शस्त्र लाइसेंस जारी किए गए हैं, जहां लाइसेंसधारकों का दो या अधिक आपराधिक मामलों का इतिहास (क्रिमिनल हिस्ट्री) रहा है।
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हाई कोर्ट के इन निष्कर्षों ने भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में शस्त्र लाइसेंसों की जांच, नवीनीकरण और निगरानी की पूरी व्यवस्था पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अदालती कार्रवाई जय शंकर द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के खिलाफ दायर एक याचिका पर हुई है, जिसमें राज्य के भीतर जारी किए गए हथियारों के लाइसेंसों के कड़े ऑडिट की मांग की गई थी।

इस मामले में कोर्ट द्वारा 11 मई को दिए गए निर्देश के अनुपालन में संयुक्त सचिव (गृह) ने 20 मई को अपनी अनुपालन रिपोर्ट (हलफनामा) कोर्ट में पेश की थी। इससे पहले, 23 मार्च को कोर्ट ने स्पष्ट रूप से वह शर्तें और आवश्यकताएं तय की थीं जिनका पालन जिला मजिस्ट्रेटों और एसएसपी को शस्त्र लाइसेंस जारी करने, नवीनीकरण या ट्रांसफर करने के दौरान अनिवार्य रूप से करना था।

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