सावुक्कू शंकर की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार; याचिकाकर्ता को मद्रास हाईकोर्ट जाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यूट्यूबर और पत्रकार सावुक्कू शंकर की तमिलनाडु गुंडा एक्ट के तहत निवारक हिरासत (Preventive Detention) को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि इस चुनौती की जांच के लिए मद्रास हाईकोर्ट ही उपयुक्त मंच होगा और याचिकाकर्ता को वहीं राहत मांगनी चाहिए।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि हाईकोर्ट में अपील की जाती है, तो वह इस मामले की शीघ्र सुनवाई पर विचार कर सकता है।

यह याचिका शंकर के भतीजे डी. भरत द्वारा दायर की गई थी, जिसमें बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) रिट जारी करने और गुंडा एक्ट के तहत शंकर के खिलाफ जारी तीसरे हिरासत आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी। अधिकारियों ने 9 अप्रैल को निवारक हिरासत आदेश पारित किया था, जिसमें शंकर को गुंडा एक्ट की धारा 2(f) के तहत “गुंडा” बताया गया था।

यह कार्रवाई 8 अप्रैल को पुझल पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज दो मामलों में उनकी गिरफ्तारी के बाद की गई थी।

शंकर की कानूनी मुश्किलें 13 दिसंबर, 2025 को शुरू हुई थीं, जब उन्हें पहली बार जबरन वसूली के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। हालांकि मद्रास हाईकोर्ट ने पहले उन्हें चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत दी थी और असहमति के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें निशाना बनाने पर राज्य सरकार की आलोचना की थी, लेकिन बाद के घटनाक्रमों के कारण उन पर नए आरोप लगाए गए।

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याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि नवीनतम हिरासत आदेश निवारक हिरासत कानूनों के “दुरुपयोग के पैटर्न” को दर्शाता है। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया कि शंकर के खिलाफ पहले के दो हिरासत आदेश न्यायिक जांच के बाद रद्द या वापस लिए जा चुके हैं।

इसके अलावा, याचिका में आरोप लगाया गया कि तमिलनाडु की डीएमके (DMK) सरकार की “अवैध और भ्रष्ट गतिविधियों” को उजागर करने के कारण राज्य की एजेंसियां शंकर को परेशान कर रही हैं। याचिका में निम्नलिखित चिंताएं भी उठाई गई थीं:

  • उनकी मां के पेंशन खाते को फ्रीज करने का आरोप।
  • उनके सहयोगियों के खिलाफ की गई कार्रवाई।
  • पहले की कैद के दौरान शंकर को अन्य कैदियों से अलग-थलग रखने के आरोप।
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इन तमाम आरोपों के बावजूद, शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसी चुनौतियों के लिए हाईकोर्ट ही प्राथमिक मंच है। इस स्तर पर मामले पर विचार करने से पीठ का इनकार जनवरी के उसके पिछले रुख के समान है, जहां कोर्ट ने यह देखते हुए जमानत की शर्तों में संशोधन करने से मना कर दिया था कि शंकर ने चिकित्सा आधार पर जमानत मिलने के बाद फिर से सोशल मीडिया और वीडियो प्रकाशित करना शुरू कर दिया था।

अब यह मामला वापस मद्रास हाईकोर्ट जाएगा, जहां “गुंडा” टैग की वैधता और निवारक हिरासत आदेश की न्यायिक समीक्षा की जाएगी।

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