हरियाणा सरकार की नियमितीकरण नीतियों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला; 1996 की नीति की बहाली को सही ठहराया, भविष्य की तारीख वाली अधिसूचनाएं रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में अनुबंध (Contractual), तदर्थ (Ad-hoc) और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण के संबंध में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक फैसले में आंशिक संशोधन किया है। कोर्ट ने 16 जून 2014 और 18 जून 2014 की उन अधिसूचनाओं को वैध माना है, जिनका उद्देश्य 1996 की नीति से वंचित रह गए कर्मचारियों को लाभ देना था। हालांकि, भविष्य की कट-ऑफ तारीख (31.12.2018) वाली 7 जुलाई 2014 की अधिसूचनाओं को कोर्ट ने मनमाना और अवैध करार दिया है। इसके बावजूद, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए, कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जो कर्मचारी इन 7 जुलाई की नीतियों के तहत पहले से लाभ पा चुके हैं और सेवा में बने हुए हैं, उन्हें हटाया नहीं जाएगा, बशर्ते उन्हें उनके पद के लिए निर्धारित न्यूनतम वेतनमान पर रखा जाए।

कानूनी मुद्दा

इस मामले में मुख्य कानूनी विवाद हरियाणा सरकार द्वारा 2014 में ग्रुप ‘B’, ‘C’ और ‘D’ कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए जारी चार अधिसूचनाओं की वैधता को लेकर था, जिन्हें हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 1996 की नीति को पुनर्जीवित करने वाली अधिसूचनाएं वैध थीं क्योंकि वे पात्र उम्मीदवारों की पिछली अनियमितताओं को दूर करती थीं, जबकि भविष्य की कट-ऑफ तारीख वाली अधिसूचनाएं बिना किसी तार्किक आधार के थीं।

मामले की पृष्ठभूमि

हरियाणा सरकार ने विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को अनुबंध या तदर्थ आधार पर नियुक्त किया था। सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम उमादेवी मामले में आए फैसले के बाद, 29 जुलाई 2011 को एक अधिसूचना जारी की गई थी ताकि उन कर्मचारियों को नियमित किया जा सके जिन्होंने 10 अप्रैल 2006 तक दस साल की सेवा पूरी कर ली थी।

इसके बाद, 2014 में राज्य सरकार ने अन्य अधिसूचनाएं जारी कीं:

  1. 16 और 18 जून, 2014: इनका उद्देश्य उन ग्रुप ‘B’, ‘C’ और ‘D’ कर्मचारियों को नियमित करना था जो 1996 की नीति के तहत पात्र थे, लेकिन 1997 में उस नीति को वापस लिए जाने के कारण लाभ नहीं पा सके थे।
  2. 7 जुलाई, 2014: इसके तहत उन कर्मचारियों को नियमित करने का प्रस्ताव था जो भविष्य की तारीख, यानी 31 दिसंबर 2018 तक अपनी दस साल की सेवा पूरी करने वाले थे।
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हाईकोर्ट ने 31 मई 2018 को इन सभी 2014 की अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता (हरियाणा राज्य और प्रभावित कर्मचारी): राज्य सरकार ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 162 के तहत कार्यकारी शक्तियों का यह प्रयोग कर्मचारियों की भारी कमी को दूर करने के लिए किया गया था। उनका कहना था कि कर्मचारी योग्य थे और स्वीकृत पदों पर नियुक्त थे, इसलिए इसे “अवैध” के बजाय “अनियमित” नियुक्ति माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने उमादेवी मामले की गलत व्याख्या की है।

प्रतिवादी (मूल याचिकाकर्ता): प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि ये अधिसूचनाएं उमादेवी फैसले की भावना के विपरीत थीं। उनका तर्क था कि नियमितीकरण भर्ती का विकल्प नहीं हो सकता और सरकार को “पिछले दरवाजे से प्रवेश” (Backdoor entry) को वैध बनाने के बजाय नियमित भर्ती प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी।

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कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने इन अधिसूचनाओं को दो श्रेणियों में विभाजित कर जांच की।

1. 16 जून और 18 जून, 2014 की अधिसूचनाओं की वैधता: कोर्ट ने पाया कि ये अधिसूचनाएं उन कर्मचारियों के लिए थीं जो 1996 की नीति के तहत हकदार थे। पीठ ने टिप्पणी की:

“सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा इन अधिसूचनाओं को जारी करने की कवायद पर मनमानेपन, अवैधता या कार्यकारी शक्ति के दुर्भावनापूर्ण प्रयोग के आधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।”

स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम एम.एल. केसरी मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “वन-टाइम मेजर” (एक बार किया जाने वाला उपाय) तब तक जारी रहता है जब तक सभी पात्र कर्मचारियों पर विचार न कर लिया जाए।

2. 7 जुलाई, 2014 की अधिसूचनाओं की वैधता: इन अधिसूचनाओं पर कोर्ट का रुख अलग था। कोर्ट ने पाया कि इनमें उन कर्मचारियों को नियमित करने की कोशिश की गई जिनकी प्रारंभिक नियुक्ति बिना किसी विज्ञापन या साक्षात्कार के हुई थी और इसके लिए भविष्य की एक मनमानी कट-ऑफ तारीख (2018) चुनी गई थी।

“7 जुलाई 2014 की इन दो अधिसूचनाओं की वैधता को बनाए रखने का हमें कोई उचित कारण नहीं दिखता, क्योंकि इनका उद्देश्य उन तदर्थ कर्मचारियों को नियमित करना है जिन्हें बिना किसी विज्ञापन और बिना साक्षात्कार के नियुक्त किया गया था।”

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कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से संशोधित करते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:

  • 1996 की नीति की बहाली: 16 जून 2014 और 18 जून 2014 की अधिसूचनाओं को वैध माना गया है। इन मानदंडों को पूरा करने वाले कर्मचारियों की सेवाएं सुरक्षित रहेंगी और उन्हें नियमित किया जाएगा।
  • भविष्य की कट-ऑफ वाली नीतियां रद्द: 7 जुलाई 2014 की अधिसूचनाओं को मनमाना और अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया गया है।
  • अनुच्छेद 142 के तहत राहत: न्याय के हित में कोर्ट ने निर्देश दिया कि जो ग्रुप ‘B’, ‘C’ और ‘D’ के तदर्थ कर्मचारी 7 जुलाई की अधिसूचनाओं के तहत लाभ पा चुके हैं और अभी भी सेवा में हैं, उन्हें सेवा से नहीं हटाया जाएगा। हालांकि, स्टेट ऑफ पंजाब बनाम जगजीत सिंह के फैसले के अनुसार, उन्हें उनके पद के “न्यूनतम वेतनमान” पर रखा जाएगा।

कोर्ट ने इस जटिल मामले में सहायता के लिए एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) श्री निधेश गुप्ता और अन्य अधिवक्ताओं के योगदान की सराहना की।

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: मदन सिंह और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 1996/2024 (और संबंधित अपीलें)
  • पीठ: जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
  • दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

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