इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 2019 में वरिष्ठ अधिवक्ता नामित करने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2019 में की गई वरिष्ठ अधिवक्ताओं की नामांकन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर नोटिस जारी किया। अदालत ने Indira Jaising बनाम सुप्रीम कोर्ट निर्णय में तय दिशा-निर्देशों से विचलन को ध्यान में रखते हुए यह आदेश दिया।

जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर 2024 के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया जिसमें अधिवक्ता विष्णु बिहारी तिवारी द्वारा दाखिल रिट याचिका को खारिज कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने 2019 की वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन प्रक्रिया की वैधता पर प्रश्न उठाते हुए प्रक्रियागत अनियमितताओं और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की अनदेखी का आरोप लगाया था।

पृष्ठभूमि

वर्ष 2019 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। उस समय की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति ने एक मूल्यांकन प्रक्रिया अपनाई थी, जिसके तहत 75 अंकों में से कम से कम 45 अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को नामांकन के लिए पात्र माना गया। स्थायी समिति द्वारा पूर्ण पीठ को भेजे गए 78 नामों में से 75 को वरिष्ठ अधिवक्ता नामित किया गया था।

हाईकोर्ट ने वर्ष 2024 में दिए अपने फैसले में इस प्रक्रिया को सही ठहराते हुए कहा कि Indira Jaising बनाम सुप्रीम कोर्ट (2017) के निर्णय के तहत स्थायी समिति को छंटनी के लिए नियम बनाने की अनुमति है, और समिति द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया वैध है।

प्रमुख मुद्दे

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी करते समय यह उल्लेख किया कि स्थायी समिति द्वारा कुल अंकों को 100 से घटाकर 75 करना Indira Jaising मामले में निर्धारित मानकों से एक विचलन है। पीठ ने यह भी ध्यान दिया कि वर्ष 2019 के बाद से इलाहाबाद हाईकोर्ट में कोई वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन नहीं हुआ है।

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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि याचिकाकर्ता न्यूनतम कटऑफ अंक प्राप्त नहीं कर सके, इसलिए उन्हें चयन प्रक्रिया को चुनौती देने का कोई अधिकार (locus standi) नहीं है। अदालत ने यह भी माना कि यद्यपि आदर्श रूप में नामांकन से पूर्व साक्षात्कार लिए जाने चाहिए, किंतु वर्तमान मामले में साक्षात्कार की अनुपस्थिति प्रक्रिया को अवैध नहीं बनाती, विशेष रूप से तब जब उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के पास स्वतः संज्ञान लेते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता नामित करने की शक्ति है।

ताज़ा परिप्रेक्ष्य

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2024 में की गई वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन प्रक्रिया पर भी गंभीर टिप्पणियां की हैं और अस्वीकृत व लंबित आवेदनों पर पुनर्विचार के निर्देश दिए हैं।

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इसके अतिरिक्त, जस्टिस ओका की अध्यक्षता वाली एक अन्य पीठ ने यह निर्णय सुरक्षित रखा है कि क्या Indira Jaising फैसले में निर्धारित सिद्धांतों की समीक्षा की आवश्यकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि उच्च न्यायालयों में वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन की प्रक्रिया को लेकर व्यापक न्यायिक परीक्षण जारी है।

अब इस मामले में आगामी सुनवाई नियत समय पर होगी।

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