सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न का निपटारा करते हुए यह माना कि केवल अलग सेवा नियमों की उपस्थिति के कारण कोई रेलवे कर्मचारी केंद्र सरकार की सिविल सेवा का सदस्य होना बंद नहीं करता। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि रेलवे कर्मचारी केंद्र सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में रहते हैं और संघ के अधीन सिविल पदों पर कार्यरत हैं। इस ऐतिहासिक निर्णय के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसने याचिकाकर्ता को उनकी पिछली रेलवे सेवा के लिए मिलने वाले वेतन लाभ (पे वेटेज) को रोक दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के सिंगल जज के उस फैसले को पूरी तरह बहाल कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता के सेवा लाभों को वैध माना गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता बेंन्सी जॉन ने 9 अगस्त 1990 को भारतीय रेलवे में जूनियर ड्राफ्ट्समैन के रूप में अपनी सेवा शुरू की थी। लगभग 10 वर्ष से अधिक की नियमित और पेंशन योग्य सेवा पूरी करने के बाद, उन्हें 24 फरवरी 2001 को रेलवे से कार्यमुक्त किया गया, ताकि वे 26 फरवरी 2001 को केरल राज्य विद्युत बोर्ड (KSEB) में सब-इंजीनियर के रूप में शामिल हो सकें। जॉन के बोर्ड सेवा में आने के बाद, रेलवे ने प्रो-राटा पेंशन दायित्व के रूप में 2,16,429 रुपये बोर्ड को भेजे, जिसका विधिवत अंकन उनकी सर्विस बुक में किया गया।
बोर्ड के वर्ष 1996 के आदेश (B.O. 2119/96) और इसके बाद कर्मचारी यूनियनों के साथ हुए द्विपक्षीय समझौतों (वर्ष 2000 और 2007) में यह प्रावधान था कि बिना किसी सेवा अंतराल के पिछली सरकारी नौकरी के अनुभव को बोर्ड की नौकरी में वेतन और सेवा लाभों (वेटेज) के लिए गिना जाएगा। इसी आधार पर जॉन को वेतन निर्धारण का लाभ मिला। हालांकि, 1 दिसंबर 2012 को बोर्ड के मुख्य आंतरिक लेखा परीक्षक ने इस लाभ को रद्द करते हुए वसूली का आदेश जारी कर दिया। इसके पीछे एकमात्र तर्क यह दिया गया कि “रेलवे सेवा को वेतन पुनरीक्षण में वेटेज के लिए केंद्र सरकार की सेवा नहीं माना जा सकता।”
इस कटौती को जॉन ने केरल हाई कोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने 21 मार्च 2017 को जॉन के पक्ष में फैसला सुनाया। लेकिन जब बोर्ड ने इसके खिलाफ अपील की, तो हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 19 अगस्त 2019 को सिंगल जज के फैसले को उलट दिया। डिवीजन बेंच ने तर्क दिया कि चूंकि रेलवे कर्मचारियों पर सामान्य केंद्रीय सिविल सेवा (सीसीएस) नियम लागू नहीं होते, इसलिए रेलवे सेवा को केंद्र सरकार की सेवा के समकक्ष नहीं रखा जा सकता। इस विसंगति को दूर करने के लिए जॉन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जैसा कि मुख्य स्रोत दस्तावेज 20692_2020_8_1501_71563_Judgement_26-May-2026.pdf में विस्तार से वर्णित है।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (बेंन्सी जॉन) की दलीलें:
- रेलवे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत केंद्र सरकार का ही एक अभिन्न विभाग है और इसके कर्मचारी पूरी तरह से केंद्र सरकार के कर्मचारी हैं।
- भारतीय रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 2(34) स्पष्ट रूप से “रेलवे कर्मचारी” को केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है।
- यूपीएससी नियमों, सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 80 और विभिन्न वेतन आयोगों ने भी हमेशा रेलवे को केंद्र सरकार का ही हिस्सा माना है।
- अलग सेवा नियम होना केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए है, इससे कर्मचारियों की बुनियादी संवैधानिक स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- बोर्ड पहले ही रेलवे से पेंशन का अंशदान स्वीकार कर चुका है, इसलिए ‘वचनबद्धता के सिद्धांत’ (प्रोमिसरी एस्टॉपेल) के तहत वह अपने वादे से पीछे नहीं घट सकता।
- रेलवे कर्मचारियों को लाभ न देना और अन्य केंद्रीय विभागों के कर्मियों को देना समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का सीधा उल्लंघन है।
- सेवानिवृत्त कर्मचारी से इस प्रकार की वसूली करना पूर्णतः अन्यायपूर्ण है, जैसा कि स्टेट ऑफ पंजाब बनाम रफीक मसीह मामले के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
प्रतिवादी (केरल राज्य विद्युत बोर्ड) की दलीलें:
- बोर्ड के नियमों में “केंद्र सरकार की सेवा” का अर्थ केवल सीसीएस (आचरण) नियम, 1964 के तहत आने वाली सेवाओं से है, जिनमें रेलवे कर्मचारी शामिल नहीं हैं।
- रेलवे कर्मचारी अपने अलग ‘रेलवे सेवा नियमों’ और ‘इंडियन रेलवे एस्टेब्लिशमेंट कोड’ द्वारा संचालित होते हैं।
- रेलवे एक सार्वजनिक उपक्रम (PSU) की तरह कार्य करता है और इसकी नियुक्तियां यूपीएससी के बजाय रेलवे भर्ती बोर्ड (आरआरबी) करता है।
- बोर्ड के आदेशों के तहत पिछली रेलवे सेवा को केवल पेंशन लाभ के लिए गिना जा सकता है, वेतन वेटेज के लिए नहीं।
- अपीलकर्ता समीक्षा (रिव्यू) के स्तर पर नए दस्तावेज पेश नहीं कर सकता, जो कि बलई चंद्र हाजरा बनाम शिवधारी जादव मामले के कानून के विपरीत है।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से दो सवालों पर विचार किया: पहला, क्या अलग सेवा नियमों के कारण एक रेलवे कर्मचारी संघ की सिविल सेवा का हिस्सा नहीं रह जाता? दूसरा, क्या बोर्ड अपने ही आदेशों और समझौतों के बाद इस लाभ को वापस लेने से कानूनन प्रतिबंधित (एस्टॉप्ड) है?
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 309 के परंतुक का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि सीसीएस नियम और रेलवे नियम दोनों ही राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए हैं। केवल नियमों की भिन्नता कर्मचारी की कानूनी स्थिति को नहीं बदलती। अदालत ने सीसीएस नियमों में रेलवे कर्मचारियों को अलग रखे जाने के प्रावधान का हवाला देते हुए यह माना:
“इस परंतुक के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, एक रेलवे कर्मचारी भी एक सरकारी कर्मचारी ही है, भले ही उस पर सीसीएस (आचरण) नियम लागू न होकर रेलवे सेवा (आचरण) नियम लागू होते हैं।”
मोती राम डेका बनाम नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे मामले का उल्लेख करते हुए बेंच ने स्पष्ट किया कि रेलवे कर्मचारियों को संविधान के अनुच्छेद 311 का सुरक्षा कवच प्राप्त है, जो केवल सिविल पद धारकों को मिलता है:
“तदनुसार, एक बार जब कोर्ट ने यह माना कि अलग सेवा नियमों के बावजूद रेलवे कर्मचारियों को अनुच्छेद 311 का संरक्षण प्राप्त था, तो यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि रेलवे कर्मचारी संघ के अधीन सिविल पदों के धारक थे…”
स्टेट ऑफ असम बनाम कनक चंद्र दत्ता मामले का हवाला देकर अदालत ने नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों के आधार पर यह माना कि रेलवे कर्मचारी पूरी तरह केंद्र सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में रहते हैं:
“…रेलवे बोर्ड को शक्तियों के हस्तांतरण से रेलवे कर्मचारी केंद्र सरकार से अलग रेलवे बोर्ड का कर्मचारी नहीं बन जाता, न ही संघ की सिविल सेवा के सदस्य के रूप में उसकी स्थिति बदलती है। संविधान के अनुच्छेद 309 के परंतुक के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए विशेष रूप से रेलवे के लिए बनाए गए नियमों के अंतर्गत सरकारी रेलवे में नियुक्त होने के बावजूद, एक रेलवे कर्मचारी केंद्र सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में संघ के मामलों के संबंध में सिविल पद धारण करने वाला व्यक्ति बना रहता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेलवे बोर्ड को शक्तियों के हस्तांतरण से रेलवे कर्मचारी केंद्र सरकार से अलग रेलवे बोर्ड का कर्मचारी नहीं बन जाता, न ही संघ की सिविल सेवा के सदस्य के रूप में उसकी स्थिति बदलती है।
फैसला सुनाया
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की अपीलों को स्वीकार करते हुए केरल हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के 19 अगस्त 2019 के फैसलों को पूरी तरह रद्द कर दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने सिंगल जज के 21 मार्च 2017 के फैसले को बहाल कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को वे सभी लाभ दिए जाएं जो सिंगल जज के फैसले के तहत मिलने थे। बोर्ड को आदेश की प्रति प्रस्तुत करने के तीन महीनों के भीतर इन सभी लाभों का भुगतान जॉन को करना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि समान स्थिति वाले अन्य कर्मचारी (जैसे डी. विष्णु नंबूथिरी) भी राहत के लिए बोर्ड से संपर्क कर सकते हैं और कोर्ट को विश्वास है कि बोर्ड उनके साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा। इस मामले में किसी भी पक्ष पर अदालती खर्च (कॉस्ट) नहीं लगाया गया।
केस का विवरण
- केस का शीर्षक: बेंन्सी जॉन बनाम केरल राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड एवं अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (Civil Appeal Nos. of 2026 – SLP (C) Nos. 1377-1380 of 2021)
- बेंच : जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
- निर्णय की तिथि: 26 मई, 2026

