₹150 करोड़ के कॉर्पोरेट फ्रॉड और न्यायिक हस्तक्षेप के आरोप पर सुप्रीम कोर्ट ने CBI, ED, SFIO व अन्य से जवाब तलब किया

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार, तेलंगाना सरकार और केंद्रीय जांच एजेंसियों को नोटिस जारी करते हुए उनसे उस याचिका पर जवाब मांगा जिसमें ₹150 करोड़ के कॉर्पोरेट धोखाधड़ी और उच्च स्तर पर न्यायिक हस्तक्षेप के आरोप लगाए गए हैं। यह मामला दिवालिया घोषित कंपनी KLSR Infratech Ltd से जुड़ा है, जिसके निलंबित निदेशकों पर भारी वित्तीय गड़बड़ी और राजनीतिक-न्यायिक संरक्षण के आरोप लगे हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले में केंद्र के गृह, वित्त, विधि एवं न्याय, और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालयों के साथ-साथ CBI, ED और SFIO को नोटिस जारी किए।

याचिका कर्ता सौरभ अग्रवाल, जो Bengal Cold Rollers Pvt Ltd के निदेशक हैं, ने आरोप लगाया है कि केएलएसआर इंफ्राटेक के निलंबित प्रबंधन ने कंपनी को दिवालिया घोषित किए जाने के बावजूद MCA पोर्टल पर कंपनी की स्थिति “active” दिखाकर ₹148.87 करोड़ के नए कर्ज लिए। यह सब कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया (CIRP) के दौरान हुआ, जिसमें कंपनी को नए व्यवसाय या ऋण गतिविधियों से रोका जाना चाहिए था।

याचिका में यह भी कहा गया है कि:

  • कंपनी ने CIRP के दौरान ही लगभग ₹6,000 करोड़ के सरकारी टेंडर हासिल किए।
  • निलंबित निदेशकों ने इंटरिम रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल (IRP) की अनुमति के बिना यह सब किया।
  • जब याचिकाकर्ता और एक अन्य लेनदार ने अपने दावे वापस लेने से इनकार कर दिया, तो तेलंगाना के राजस्व विभाग और GST अधिकारियों द्वारा उनके परिवार पर दबाव बनाया गया।
  • याचिकाकर्ता के परिवार के सदस्य को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर गिरफ्तार तक कर लिया गया।
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सबसे चौंकाने वाला आरोप NCLAT चेन्नई की कार्यवाही से जुड़ा है। याचिका के मुताबिक, NCLAT के सदस्य न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा ने खुद को मामले से अलग करते हुए खुली अदालत में यह खुलासा किया कि एक उच्च न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश ने उनसे केएलएसआर के निलंबित निदेशकों के पक्ष में आदेश देने का अनुरोध किया था।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कथित रूप से अदालत में अपना मोबाइल फोन दिखाया जिसमें कॉल लॉग्स और संदेश मौजूद थे। याचिका में 13 अगस्त 2025 की उस कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग और ट्रांस्क्रिप्ट जारी करने की मांग की गई है।

  • CBI और SFIO से मामले की जांच कराई जाए ताकि राज्य एजेंसियों और कंपनी के प्रबंधन के बीच मिलीभगत सामने लाई जा सके।
  • ED से मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कराई जाए।
  • MCA को निर्देश दिया जाए कि वह कंपनी की स्थिति “under CIRP” के रूप में अपडेट करे ताकि आगे की संपत्ति हेराफेरी रोकी जा सके।
  • NCLAT रजिस्ट्रार को 13 अगस्त की कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग और ट्रांस्क्रिप्ट सार्वजनिक करने का निर्देश दिया जाए।
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पीठ ने सभी संबंधित पक्षों से इस पर जवाब मांगा है। यह मामला कॉर्पोरेट गवर्नेंस, दिवाला कानून के अनुपालन और न्यायिक पारदर्शिता को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक सवाल खड़े करता है।

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