दिल्ली आबकारी नीति मामला: ईडी की याचिका पर केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित 23 आरोपियों से जवाब तलब, दिल्ली हाईकोर्ट में 19 मार्च को अगली सुनवाई

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आबकारी नीति मामले में आरोपित 21 अन्य लोगों से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें ट्रायल कोर्ट के आदेश में एजेंसी के खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग की गई है। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को निर्धारित की गई है।

न्यायमूर्ति स्वराना कांता शर्मा की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। यह याचिका उस ट्रायल कोर्ट आदेश से जुड़ी है, जिसमें सीबीआई द्वारा दर्ज मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में की गई कुछ टिप्पणियां सामान्य प्रकृति की प्रतीत होती हैं और उनका सीधे तौर पर मामले से संबंध नहीं दिखता। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ट्रायल जज ने संभवतः जांच प्रक्रिया को लेकर अपनी सामान्य धारणा व्यक्त की थी।

ईडी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने ऐसे मामले में एजेंसी के खिलाफ गंभीर टिप्पणियां कर दीं, जिसमें ईडी पक्षकार ही नहीं थी। उन्होंने कहा कि एजेंसी को सुने बिना उसके खिलाफ आरोप जैसे निष्कर्ष दर्ज करना उचित नहीं है और ऐसी टिप्पणियां भविष्य के मामलों में ईडी के खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती हैं।

राजू ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि स्पष्ट किया जाए कि ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियां अन्य मामलों को प्रभावित नहीं करेंगी।

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दूसरी ओर, आरोपियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि ईडी जिन टिप्पणियों को लेकर आपत्ति जता रही है, उन्हें पूरे आदेश के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। उनका कहना था कि इन टिप्पणियों को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपियों को ईडी की याचिका पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को, जिसमें आरोपियों को आरोपमुक्त किया गया था, पहले ही सीबीआई द्वारा चुनौती दी जा चुकी है।

अपनी याचिका में ईडी ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में एजेंसी की उस जांच का भी उल्लेख किया है, जो मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत स्वतंत्र रूप से की जा रही है, जबकि ईडी इस कार्यवाही में पक्षकार ही नहीं थी और उसे अपनी बात रखने का अवसर भी नहीं दिया गया।

ईडी का कहना है कि यदि ऐसी व्यापक और असंबद्ध टिप्पणियां रिकॉर्ड पर बनी रहती हैं, तो इससे एजेंसी के साथ-साथ व्यापक जनहित को भी गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। एजेंसी ने इसे न्यायिक सीमा से परे जाकर की गई टिप्पणी बताते हुए संबंधित पैराग्राफ हटाने की मांग की है।

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यह विवाद 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए उस आदेश के बाद सामने आया, जिसमें सीबीआई के मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था। ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सीबीआई का मामला न्यायिक परीक्षण के सामने टिक नहीं पाया और पूरी तरह अविश्वसनीय साबित हुआ।

अदालत ने यह भी कहा था कि कथित साजिश का आरोप केवल अनुमान और अटकलों पर आधारित है और इसके समर्थन में कोई स्वीकार्य साक्ष्य मौजूद नहीं है। अदालत के अनुसार ऐसे हालात में आरोपियों को पूर्ण आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए बाध्य करना न्याय के हित में नहीं होगा।

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ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी चिंता व्यक्त की थी कि केवल अस्थायी या अपरीक्षित आरोपों के आधार पर लंबे समय तक हिरासत में रखना न्यायिक प्रक्रिया को दंडात्मक स्वरूप दे सकता है और इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

अदालत ने यह भी कहा था कि मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध तब तक स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रह सकता जब तक उसके आधार में कोई वैध मूल अपराध स्थापित न हो।

अब दिल्ली हाईकोर्ट ईडी की उस मांग पर विचार करेगा, जिसमें ट्रायल कोर्ट के आदेश से एजेंसी से संबंधित टिप्पणियों को हटाने की अपील की गई है। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।

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