दिल्ली दंगा मामला: UAPA में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों में टकराव, क्या अब बड़ी बेंच तय करेगी कानून?

क्या आतंकवाद विरोधी सख्त कानून ‘यूएपीए’ (UAPA) के तहत दर्ज मामलों में मुकदमे की लंबी देरी को आरोपी की जमानत का आधार बनाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को इस गंभीर कानूनी सवाल पर तीखी बहस हुई।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने संकेत दिया है कि वह 2020 के दिल्ली दंगों के दो आरोपियों—अब्दुल खालिद सैफी और तसलीम अहमद—को अंतरिम जमानत दे सकती है। हालांकि, इसके साथ ही अदालत दिल्ली पुलिस की उस मांग पर भी विचार करने के लिए सहमत हो गई है, जिसमें यूएपीए के तहत जमानत के नियमों को स्पष्ट करने के लिए इस मामले को सुप्रीम कोर्ट की ही एक बड़ी बेंच (Larger Bench) को भेजने का अनुरोध किया गया है।

दिल्ली पुलिस की दलील: ‘कसाब और हाफिज सईद को भी मिल जाती जमानत?’

सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस का पक्ष रख रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट के सामने एक तीखा सवाल रखा। उन्होंने तर्क दिया कि केवल मुकदमे में देरी या लंबे समय से जेल में होने को UAPA के तहत जमानत पाने का ‘ब्लैंकेट फॉर्मूला’ (एक जैसा नियम) नहीं माना जा सकता।

राजू ने 2008 के मुंबई आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब और पाकिस्तानी आतंकी हाफिज सईद का उदाहरण देते हुए कहा:

“कसाब के मामले में गवाहों की भारी संख्या के कारण मुकदमा सात साल तक खिंच गया था। तो क्या इसका मतलब यह है कि कोर्ट कसाब को जमानत दे देता? अगर हाफिज सईद को भारत लाया जाए, तो उसके मामले में भी बड़ी संख्या में गवाह होंगे और मुकदमे में देरी होगी। क्या उसे भी कोर्ट जमानत पर रिहा कर देगा? सब कुछ मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है।”

एएसजी राजू ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यूएपीए के तहत खूंखार अपराधियों की जमानत याचिकाएं खारिज की हैं। कोर्ट को मुख्य साजिशकर्ताओं और छोटे-मोटे सहयोगियों की भूमिका में अंतर करना चाहिए, न कि सब पर एक ही नियम लागू करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों में सीधी टक्कर

इस पूरे मामले में कानूनी जटिलता सुप्रीम कोर्ट की ही दो अलग-अलग पीठों के हालिया फैसलों में विरोधाभास के कारण पैदा हुई है:

  1. 5 जनवरी का फैसला (उमर खालिद और शारजील इमाम मामला): सुप्रीम कोर्ट की एक दो-सदस्यीय पीठ (जिसमें जस्टिस अरविंद कुमार भी शामिल थे) ने दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के आरोपी उमर खालिद और शारजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि वे सुरक्षित गवाहों के बयान दर्ज होने के एक साल बाद ही दोबारा जमानत याचिका दायर कर सकते हैं।
  2. 18 मई का फैसला (सैयद इफ्तिखार अंद्राबी मामला): इसके ठीक उलट, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने एक नार्को-टेरर मामले में आरोपी को जमानत दे दी। जस्टिस भुइयां ने 5 जनवरी के फैसले पर “गंभीर आपत्ति” जताते हुए कहा कि यह कानून का सही रूप नहीं है। उन्होंने 2021 के ऐतिहासिक ‘के. ए. नजीब’ फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि मुकदमे में अत्यधिक देरी होने पर यूएपीए की सख्त कानूनी बंदिशों को दरकिनार कर जमानत दी जा सकती है। उन्होंने साफ कहा कि “जमानत एक नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत कोई खोखला नारा नहीं है।
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एएसजी राजू ने शुक्रवार को अदालत से कहा कि 18 मई का फैसला कानूनी रूप से सही स्थिति पेश नहीं करता क्योंकि उसने आरोपियों के वर्गीकरण पर ध्यान नहीं दिया और मुकदमे की देरी के प्रभाव को सामान्य मान लिया।

कोर्ट का रुख और अगली राह

बहस के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने टिप्पणी की कि अन्य गंभीर मामलों में, जहाँ उम्रकैद या मौत की सजा का प्रावधान है, अगर मुकदमे में देरी के लिए आरोपी जिम्मेदार नहीं है, तो अदालतें आमतौर पर जमानत दे देती हैं।

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इस पर राजू ने दोहराया कि दो साल की देरी का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि यूएपीए के सभी आरोपियों को जमानत दे दी जाए।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले में तत्काल राहत और दीर्घकालिक कानूनी स्पष्टता के बीच संतुलन बनाने का रास्ता चुना है।

अदालत ने आरोपियों के वकीलों—रेबेका जॉन (सैफी की वकील) और महमूद प्राचा (अहमद के वकील)—से कहा, “पूरी संभावना है कि हम राहत (जमानत) देने पर विचार करेंगे। हालांकि, हम इस कानूनी सवाल को बड़ी बेंच को भेजने की दिल्ली पुलिस की दलीलों पर भी गौर करेंगे।” कोर्ट इस मामले पर जल्द ही अपना आधिकारिक आदेश सुना सकता है।

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