इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) के क्षेत्रीय निदेशक को मल्टी-टास्किंग स्टाफ (MTS) के पद पर चयनित एक अभ्यर्थी को ज्वाइनिंग लेटर जारी करने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जिस आपराधिक मामले में अभ्यर्थी को किशोर (नाबालिग) घोषित किया जा चुका है और एक अन्य मामला जिसमें पुलिस द्वारा अंतिम क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी है, उनका लंबित होना सार्वजनिक रोजगार पाने में पूर्ण बाधा नहीं बन सकता।
जस्टिस श्री प्रकाश सिंह की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता की रिट याचिका को स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की कि किसी अभ्यर्थी को बिना दोषसिद्धि के केवल आरोपों के आधार पर उसकी आजीविका से वंचित करना अनुचित और अन्यायपूर्ण है।
मामले की पृष्ठभूमि
कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) ने 28 दिसंबर 2021 को उत्तर प्रदेश क्षेत्र में अपर डिवीजन क्लर्क (UDC), स्टेनोग्राफर और मल्टी-टास्किंग स्टाफ (MTS) के पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। याचिकाकर्ता सुशील त्रिपाठी ने सामान्य श्रेणी के तहत MTS पद के लिए आवेदन किया था। 5 जून 2022 को आयोजित मुख्य परीक्षा (फेज-II) उत्तीर्ण करने के बाद, 10 जून 2024 को जारी अतिरिक्त शॉर्टलिस्टेड अभ्यर्थियों की सूची में उनका नाम आया।
20 जून 2024 को दस्तावेजों के सत्यापन के बाद, याचिकाकर्ता को 9 जुलाई 2024 को नियुक्ति का प्रस्ताव (ऑफर ऑफ अपॉइंटमेंट) मिला। उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और 18 जुलाई 2024 को कानपुर स्थित ESIC के क्षेत्रीय कार्यालय में अपना सत्यापन फॉर्म (अटेस्टेशन फॉर्म) जमा कर दिया। इस फॉर्म में उन्होंने अपने खिलाफ लंबित दो आपराधिक मामलों का पूरा विवरण खुद साझा किया:
- N.C.R. संख्या 93/2015 (धारा 323 और 504 आईपीसी, थाना भीती, अंबेडकर नगर), जिसमें बाद में 20 दिसंबर 2024 को उन्हें किशोर न्याय बोर्ड द्वारा किशोर (नाबालिग) घोषित कर दिया गया था।
- F.I.R. संख्या 50/2020 (धारा 419, 420, 467, 468, और 471 आईपीसी, थाना भीती, अंबेडकर नगर), जिसमें जांच अधिकारी ने जांच पूरी कर ट्रायल कोर्ट के समक्ष अंतिम रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट संख्या 57/2022) प्रस्तुत कर दी थी।
याचिकाकर्ता के साथ चयनित अन्य अभ्यर्थियों को ज्वाइनिंग दे दी गई, लेकिन याचिकाकर्ता का ज्वाइनिंग लेटर रोक दिया गया। 13 फरवरी 2025 को ESIC ने उन्हें सूचित किया कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के 30 मार्च 2016 के पत्र के अनुसार, नियुक्ति को अंतिम रूप देने और ज्वाइनिंग लेटर जारी करने से पहले पुलिस सत्यापन एक अनिवार्य शर्त है।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें: याचिकाकर्ता की ओर से वकील श्री विजय बहादुर सिंह और श्री रोहित कुमार सिंह पेश हुए। याचिकाकर्ता के पक्ष में दलील देते हुए श्री रोहित कुमार सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता ने बिना कुछ छुपाए अपने आपराधिक इतिहास का पूरा खुलासा खुद किया था। 2015 के मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को किशोर अपचारी (नाबालिग) घोषित किया जा चुका है। स्थापित कानून के अनुसार, किसी किशोर के खिलाफ लंबित आपराधिक मामला नौकरी पाने के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता।
2020 की एफआईआर के संबंध में उन्होंने कहा कि चूंकि जांच अधिकारी ने क्लोजर रिपोर्ट पहले ही ट्रायल कोर्ट में दाखिल कर दी है, इसलिए यह मामला भी याचिकाकर्ता की नियुक्ति में आड़े नहीं आना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता लंबे समय से नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं, जबकि उनके साथ चयनित अन्य अभ्यर्थी पहले से ही सेवा में हैं।
प्रतिवादियों के वकील की दलीलें: इसके विपरीत, प्रतिवादियों की तरफ से भारत सरकार के सहायक सॉलिसिटर जनरल (A.S.G.I.), राज्य के मुख्य स्थायी अधिवक्ता (C.S.C.) और वकील श्री रण विजय सिंह उपस्थित हुए।
ESIC (प्रतिवादी संख्या 2 और 3) का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील श्री रण विजय सिंह ने तर्क दिया कि नियुक्ति का प्रस्ताव जरूर जारी किया गया था, लेकिन दो आपराधिक मामलों के खुलासे और प्रतिकूल पुलिस सत्यापन रिपोर्ट के कारण ज्वाइनिंग को रोका गया है। उन्होंने आगे कहा कि याचिकाकर्ता के 18 अगस्त 2025 के प्रतिवेदन (रिप्रेजेंटेशन) को मुख्यालय कानूनी राय के लिए भेजा गया है, जो अभी विचाराधीन है। इसलिए, प्रतिवादियों का कहना था कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहत समय से पहले है और यह याचिका विचारणीय नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने इस मुख्य कानूनी प्रश्न पर विचार किया कि क्या इन दोनों मामलों का लंबित होना याचिकाकर्ता को ज्वाइनिंग लेटर जारी करने पर पूर्ण रोक लगा सकता है।
1. किशोर अपचारी से जुड़े मामले का प्रभाव
2015 के मामले (N.C.R. संख्या 93/2015) का विश्लेषण करते हुए, कोर्ट ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 की धारा 19 का हवाला दिया, जो दोषसिद्धि से जुड़ी अयोग्यताओं को हटाने का प्रावधान करती है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“उपरोक्त प्रावधान को स्पष्ट रूप से पढ़ने से यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि एक किशोर, जिसने कोई अपराध किया है और जिसके खिलाफ इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की गई है, वह किसी भी अयोग्यता का भागी नहीं होगा… इस प्रकार, विधायिका की मंशा बहुत स्पष्ट है कि यदि किशोर को किसी अपराध के लिए दोषी भी ठहराया गया हो, तो भी वह अयोग्य नहीं माना जाएगा।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रमेश बिश्नोई (2019) 19 SCC 710 का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग रहते हुए किए गए अपराधों के आधार पर किसी को नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस कानून का मुख्य उद्देश्य किशोर को बिना किसी सामाजिक कलंक के मुख्यधारा में वापस लाना है।
हाईकोर्ट ने इस संबंध में अपनी ही खंडपीठ के एक अन्य फैसले नवोदय विद्यालय समिति बनाम पुंडरीकाक्ष देव पाठक (रिट ए संख्या 9462/2025) का भी उल्लेख किया:
“…एक किशोर की दोषसिद्धि भी उसकी सेवाओं के संदर्भ में अप्रासंगिक पाई गई है और वर्तमान मामला तो बहुत बेहतर स्थिति में है जहां याचिकाकर्ता के खिलाफ मुकदमा लंबित है।”
2. लंबित क्लोजर रिपोर्ट का प्रभाव
दूसरे मामले (2020 की एफआईआर) पर विचार करते हुए, जिसमें पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी लेकिन कोर्ट ने अभी तक कोई आदेश पारित नहीं किया था, हाईकोर्ट ने अदालतों में लंबित मुकदमों के भारी बोझ का संज्ञान लिया। कोर्ट ने कहा कि यदि जांच अधिकारी को आरोपों में कोई सच्चाई नहीं मिलती और वह फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर देता है, तो ट्रायल कोर्ट के फैसले में देरी के कारण किसी अभ्यर्थी के करियर को अंतहीन समय तक अधर में नहीं छोड़ा जा सकता:
“यह मान भी लें कि यदि ट्रायल कोर्ट काफी देरी से फाइनल रिपोर्ट को स्वीकार करता है, तो ऐसे आरोपी व्यक्ति को अपूरणीय क्षति और नुकसान उठाना पड़ेगा, जिसकी भरपाई किसी भी तरह से नहीं की जा सकती। वास्तव में यह कभी भी किसी कानून की मंशा नहीं हो सकती।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि यदि आरोप गंभीर प्रकृति के नहीं हैं और पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है, तो अभ्यर्थियों को आजीविका के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। यदि भविष्य में ट्रायल कोर्ट इस रिपोर्ट को खारिज कर आरोपी को दोषी ठहराता है, तो विभाग के पास संबंधित कर्मचारी को सेवा से बाहर करने का कानूनी विकल्प हमेशा खुला रहता है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले स्टेट ऑफ गुजरात बनाम सूर्य कांत चुनीलाल शाह (1999) 1 SCC 529 का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा:
“…की अयोग्यता का आधार केवल कथित संलिप्तता नहीं हो सकता। किसी आपराधिक मामले में आरोपी की संलिप्तता के आरोप का मतलब यह नहीं है कि वह कथित अपराध का दोषी है… केवल कथित संलिप्तता के आधार पर किसी व्यक्ति को उसकी आजीविका से वंचित करना अत्यधिक अनुचित और अन्यायपूर्ण होगा। वंचित करने के ऐसे निर्णय के किसी आरोपी के लिए दूरगामी परिणाम होंगे, जो न तो सामान्य ज्ञान के आधार पर और न ही किसी कानून के तहत न्यायोचित है। कानून समाज को व्यवस्थित करने के लिए बने हैं। कानूनों का अनुप्रयोग कभी भी शून्य में नहीं हो सकता, बल्कि वास्तव में यह काफी हद तक इंसानों को प्रभावित करता है। यदि कानून का अनुप्रयोग किसी व्यक्ति के दिल को राहत देता है, तो वास्तव में सही मायने में उस कानून का उद्देश्य सफल होता है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद, हाईकोर्ट ने याचिका में दम पाया और रिट याचिका को स्वीकार कर लिया।
हाईकोर्ट ने विपक्षी पार्टी संख्या 3 (क्षेत्रीय निदेशक, कर्मचारी राज्य बीमा निगम, क्षेत्रीय कार्यालय, कानपुर, उत्तर प्रदेश) को निर्देश दिया कि वे लंबित आपराधिक मामलों को दरकिनार करते हुए याचिकाकर्ता को ज्वाइनिंग लेटर जारी करें। यह प्रक्रिया इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के तीस दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: सुशील त्रिपाठी बनाम भारत संघ व अन्य
- केस नंबर: रिट ए संख्या 12130 ऑफ 2025
- पीठ: जस्टिस श्री प्रकाश सिंह
- दिनांक: 21 मई, 2026
- याचिकाकर्ता के वकील: विजय बहादुर सिंह, रोहित कुमार सिंह
- प्रतिवादी के वकील: ए.एस.जी.आई., सी.एस.सी., रण विजय सिंह

