भोजशाला ASI सर्वे: मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों पर सुनवाई करेगा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने दिए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि धार स्थित विवादित भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण (ASI सर्वे) को लेकर मुस्लिम पक्ष द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट विचार करेगा।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वे हाईकोर्ट की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण से जुड़ी सभी आपत्तियों की सुनवाई ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ (Natural Justice) के अनुरूप हो।

यह मामला तब शीर्ष अदालत पहुँचा जब मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने सर्वे के निष्कर्षों तक पहुंच को लेकर चिंता जताई। खुर्शीद ने तर्क दिया कि मुस्लिम पक्ष को अपनी आपत्तियां सही ढंग से दर्ज करने के लिए एएसआई (ASI) द्वारा की गई वीडियोग्राफी और रंगीन तस्वीरों की आवश्यकता है।

अदालत में खुर्शीद ने कहा, “हमने कई आपत्तियां उठाई हैं। हमारा अनुरोध है कि सर्वे की वीडियोग्राफी और रंगीन तस्वीरें हमें सौंपी जाएं ताकि हम अपनी आपत्तियों को विस्तार से रख सकें।”

पीठ ने इस पर संज्ञान लिया कि हाईकोर्ट पहले ही इन आपत्तियों के लिए एक प्रक्रियात्मक समयरेखा तय कर चुका है। जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि वीडियोग्राफी को खुली अदालत में चलाया जाएगा, जिससे सभी पक्षों को इसकी शुद्धता पर सवाल उठाने का अवसर मिलेगा।

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चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित किए हैं और वह अंतिम सुनवाई के चरण में आपत्तियों को सुनेगा। उन्होंने कहा, “हमें कोई संदेह नहीं है कि हाईकोर्ट वीडियोग्राफी का अवलोकन करने के बाद प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार आपत्तियों पर विचार करेगा।”

धार जिले में स्थित यह 11वीं सदी का स्मारक लंबे समय से विवाद का केंद्र रहा है। हिंदू पक्ष इसे वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर ‘भोजशाला’ मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष का दावा है कि यह ‘कमल मौला मस्जिद’ है।

साल 2003 में एएसआई द्वारा की गई व्यवस्था के तहत, हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार को परिसर में पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज अदा करने की इजाजत दी गई है। वर्तमान कानूनी लड़ाई परिसर के स्थायी धार्मिक स्वरूप को निर्धारित करने के लिए लड़ी जा रही है।

हाईकोर्ट के आदेश पर एएसआई ने परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। लगभग 2,000 पन्नों की इस रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि:

  • मस्जिद के निर्माण में प्राचीन मंदिरों के अवशेषों, नक्काशीदार खंभों और मूर्तियों के टुकड़ों का पुनः उपयोग किया गया है।
  • खुदाई के दौरान मिले शिलालेख और स्लैब संकेत देते हैं कि यह स्थल कभी साहित्यिक और शैक्षिक गतिविधियों से जुड़ा था।
  • वर्तमान ढांचे से पहले वहां परमार राजाओं के शासनकाल का एक विशाल ढांचा मौजूद था।
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जहां हिंदू पक्ष के अधिवक्ता वरुण सिन्हा और विष्णु शंकर जैन का दावा है कि ये निष्कर्ष साबित करते हैं कि यह मूल रूप से एक मंदिर था, वहीं मुस्लिम पक्ष ने सर्वे की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि एएसआई ने उनकी शुरुआती आपत्तियों को नजरअंदाज किया और सर्वे में ऐसी वस्तुओं को शामिल किया जो वहां बाद में रखी गई थीं।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी ने 28 मार्च को स्वयं स्थल का निरीक्षण किया था। अब हाईकोर्ट इस मामले में आगे की नियमित सुनवाई जारी रखेगा।

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