राजस्थान हाईकोर्ट की राज्य सरकार को फटकार: सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति में 12 साल की देरी पर मांगा जवाब

राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य के स्वच्छता विभाग में जनशक्ति की भारी कमी और सफाई कर्मचारियों (सफाई कर्मचारी) की भर्ती में हो रही अत्यधिक देरी पर कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने 2012 और 2018 के भर्ती अभियानों के तहत चयनित उम्मीदवारों की नियुक्तियां अब तक लंबित रहने पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।

इंदरराज निदानिया और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस रवि चिरानिया की एकल पीठ ने सरकार को नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए पूछा है कि अलग-अलग नगरीय निकायों में नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर दोहरा मापदंड क्यों अपनाया जा रहा है।

सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि राज्य के 309 नगरीय निकायों में भर्ती प्रबंधन में काफी विसंगतियां हैं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि राजखेड़ा, कोटा, राजसमंद, टोंक और चूरू जैसे नगर निकायों में नियुक्तियां दी जा चुकी हैं, जबकि जयपुर नगर निगम जैसे बड़े केंद्रों में यह प्रक्रिया लंबे समय से अटकी हुई है।

कोर्ट ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है कि आखिर क्यों अलवर नगर निगम में शुरू की गई नियुक्ति प्रक्रिया को जयपुर सहित अन्य निकायों में लागू नहीं किया गया। इस “चयनात्मक नियुक्ति” प्रणाली के कारण सैकड़ों योग्य उम्मीदवार वर्षों से अधर में लटके हुए हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता अभिनव शर्मा ने राज्य के स्वच्छता ढांचे से जुड़े चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि राजस्थान में स्वीकृत पदों में से लगभग 23,820 पद रिक्त पड़े हैं, जो मैनपावर की भारी कमी को दर्शाता है।

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राजधानी जयपुर की स्थिति सबसे चिंताजनक है, जहां पिछले 14 वर्षों से 4,077 पद खाली हैं। याचिकाओं में तर्क दिया गया कि कर्मचारियों की इस कमी का सीधा असर राज्य की स्वच्छता सेवाओं और जन स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

याचिकाकर्ताओं (जिनमें से अधिकांश वाल्मीकि समुदाय से हैं) का आरोप है कि उन्हें जानबूझकर दरकिनार किया जा रहा है। कोर्ट को बताया गया कि “कमेटी समीक्षा” के नाम पर वर्षों से नियुक्तियां टाली जा रही हैं।

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याचिका में उठाए गए मुख्य बिंदु:

  • समझौतों का उल्लंघन: जयपुर में हड़ताल के बाद 2024 में हुए एक समझौते में जल्द नियुक्ति का आश्वासन दिया गया था। इसके विपरीत, सरकार ने 2024-25 के लिए नई भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश की, जिसे बाद में वापस ले लिया गया।
  • पुराने अदालती आदेश: याचिकाकर्ताओं ने ललित कुमार मामले में 2017 के हाईकोर्ट के आदेश का हवाला दिया, जिसमें 2012 की भर्ती को तीन महीने में पूरा करने का निर्देश दिया गया था।
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: सुनवाई के दौरान सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया गया, जो हाथ से मैला ढोने वालों के पुनर्वास और सरकारी नौकरियों में उन्हें प्राथमिकता देने पर जोर देता है।
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याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि उन्हें जयपुर, राजगढ़ और ब्यावर सहित विभिन्न निकायों में रिक्त पदों पर उसी तर्ज पर नियुक्ति दी जाए, जैसे अन्य चुनिंदा नगर पालिकाओं में दी गई है।

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