सरकार विरोधी नारेबाजी देशद्रोह नहीं, यह केवल असहमति जताने का जरिया: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार या उसके किसी विभाग के खिलाफ नारेबाजी करना देशद्रोह के दायरे में नहीं आता। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार विरोधी नारे लगाना केवल अपनी असहमति या असंतोष प्रकट करने का एक माध्यम है, इसे सरकार के प्रति नफरत, अवमानना या दुर्भावना फैलाने की कोशिश नहीं माना जा सकता। जस्टिस विनोद एस भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए हरियाणा सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें कैथल के चार निवासियों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंसक विरोध प्रदर्शन को दंगे की श्रेणी में तो रखा जा सकता है, लेकिन हर हिंसक गतिविधि को सरकार के खिलाफ नफरत या अवमानना फैलाने की कोशिश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि किसी नागरिक के मन में सरकार के प्रति निराशा, असंतोष या गुस्सा होना देशद्रोह या नफरत फैलाने के कानूनी पैमाने पर खरा नहीं उतरता। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि जब आरोप बेहद गंभीर हों और उनमें सख्त सजा का प्रावधान हो, तो अदालत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मामले के सभी कानूनी पहलू और जरूरी तत्व पूरी तरह से साबित होते हों। इस मामले में पुलिस के सबूत केवल सरकार विरोधी नारेबाजी की ओर इशारा करते हैं, जो कि असहमति जताने का संवैधानिक अधिकार है।

डेरा प्रमुख की सजा के बाद भड़की हिंसा से जुड़ा है मामला

यह पूरा मामला 25 अगस्त 2017 का है, जब पंचकूला की एक अदालत ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बलात्कार के मामले में दोषी करार दिया था। इस अदालती फैसले के बाद कैथल के कलायत इलाके में हिंसा भड़क गई थी। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (UHBVN) के कलायत स्थित सब-डिवीजनल अधिकारी (SDO) ने शिकायत दर्ज कराई थी कि लाठियों, पारंपरिक धारदार हथियारों (गंडासा) और पेट्रोल से भरी बोतलों से लैस 14-15 लोगों की भीड़ नारेबाजी करते हुए उनके दफ्तर की तरफ बढ़ी। जान का खतरा देखकर अधिकारी और कर्मचारी दफ्तर छोड़कर भाग गए, जिसके बाद भीड़ ने वहां तोड़फोड़ की।

इस घटना के बाद कलायत पुलिस स्टेशन में आरोपियों के खिलाफ देशद्रोह (धारा 124-ए), गैर-कानूनी आदेश की नाफरमानी (धारा 188), आपराधिक साजिश (धारा 120-बी) और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़े कानूनों के तहत मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, 23 सितंबर 2019 को एक निचली अदालत ने चारों आरोपियों को बरी कर दिया था। हरियाणा सरकार ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसे अब खारिज कर दिया गया है।

पहचान परेड न होने और जांच की कमियों पर उठाए सवाल

हाईकोर्ट ने पुलिस जांच में कई गंभीर खामियों को रेखांकित किया। अदालत ने पाया कि इस पूरे मामले में पुलिस ने कोई शिनाख्त परेड (टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड) नहीं कराई, जबकि गवाह पहले से आरोपियों को नहीं जानते थे। गवाहों ने आरोपियों को पहली बार सीधे अदालत की कार्यवाही के दौरान ही पहचाना। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में, जहां आरोपियों की पहचान ही पूरे मामले का आधार हो और गवाह उनके लिए अजनबी हों, वहां शिनाख्त परेड कराना बेहद जरूरी होता है।

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अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने आरोपियों को किन्हीं छोटी-मोटी कमियों के आधार पर बरी नहीं किया था, बल्कि यह फैसला जांच में गंभीर विरोधाभासों, सबूतों की कमी, संदिग्ध बरामदगी और आरोपियों की सही पहचान न होने की वजह से लिया गया था। इसके साथ ही, मामले में कोई फोरेंसिक सबूत भी नहीं पेश किया गया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी आरोपी को सजा दिलाने के लिए केवल यह आशंका काफी नहीं है कि वह घटना में “शामिल हो सकता था”, बल्कि कानूनन यह साबित करना जरूरी है कि वह “शामिल ही था”। महज संदेह या अनुमान को कानूनी सबूत नहीं माना जा सकता।

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