शुल्क लेकर आयोजित योग शिविर ‘हेल्थ एंड फिटनेस सर्विस’ के अंतर्गत करयोग्य: पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट की क्यूरेटिव याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट को बड़ा झटका देते हुए उसकी क्यूरेटिव याचिका खारिज कर दी और यह स्पष्ट किया कि शुल्क लेकर आयोजित किए गए आवासीय तथा गैर-आवासीय योग शिविरों पर सेवा कर देय होगा।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां शामिल थे, ने 4 फरवरी के आदेश में कहा कि Rupa Ashok Hurra v. Ashok Hurra में निर्धारित सीमित मानकों के भीतर क्यूरेटिव याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। पीठ ने ट्रस्ट की ओपन कोर्ट में सुनवाई की मांग भी अस्वीकार कर दी।

क्यूरेटिव याचिका उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें न्यायमूर्ति अभय एस. ओका (सेवानिवृत्त) और न्यायमूर्ति भुइयां की पीठ ने 7 जनवरी 2025 को ट्रस्ट की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी।

इससे पहले, 19 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने कस्टम, एक्साइज एवं सर्विस टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (CESTAT), इलाहाबाद पीठ के 5 अक्टूबर 2023 के निर्णय को बरकरार रखा था। तब कोर्ट ने कहा था:

“ट्रिब्यूनल ने सही पाया है कि शुल्क लेकर आयोजित योग शिविर एक सेवा है। हमें हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं मिलता।”

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ट्रिब्यूनल ने पाया कि पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट द्वारा आयोजित योग प्रशिक्षण शिविर “हेल्थ क्लब एवं फिटनेस सेंटर” की करयोग्य सेवा की श्रेणी में आते हैं, जैसा कि वित्त अधिनियम की धारा 65(52) में परिभाषित है।

ट्रस्ट शिविरों में भागीदारी के लिए जो राशि “दान” के रूप में ले रहा था, उसे ट्रिब्यूनल ने सेवा के लिए प्रतिफल माना। आदेश में कहा गया कि—

  • विभिन्न मूल्य के प्रवेश टिकट जारी किए जाते थे
  • टिकट के मूल्य के अनुसार अलग-अलग सुविधाएं दी जाती थीं
  • टिकट के बिना शिविर में प्रवेश संभव नहीं था
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ट्रिब्यूनल ने इसे “दान के रूप में छिपाया गया शुल्क” बताया।

मेरठ के कस्टम एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्त द्वारा अक्टूबर 2006 से मार्च 2011 की अवधि के लिए लगभग ₹4.5 करोड़ का सेवा कर, ब्याज और दंड सहित, निर्धारित किया गया था।

ट्रस्ट का तर्क था कि योग शिविर रोगों के उपचार के लिए आयोजित किए जाते हैं और इसलिए वे “हेल्थ एंड फिटनेस सर्विस” के अंतर्गत करयोग्य नहीं हैं। ट्रिब्यूनल ने इस दलील को साक्ष्य के अभाव में अस्वीकार कर दिया और कहा—

  • योग एवं ध्यान सामूहिक रूप से सिखाया जाता था
  • किसी व्यक्ति के लिए लिखित निदान या उपचार पर्ची नहीं दी जाती थी
  • व्यक्तिगत चिकित्सा सेवा का कोई प्रमाण नहीं था
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इसलिए इसे सामान्य फिटनेस सेवा माना गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्यूरेटिव याचिका केवल अत्यंत सीमित परिस्थितियों में ही स्वीकार की जाती है और इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं बनता।

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