स्थानांतरित (Transfer) नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति दीपक खोत की पीठ ने पत्नी द्वारा दायर स्थानांतरण याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि सिर्फ महिला होने का अर्थ यह नहीं है कि वह यात्रा करने में असमर्थ है। हालांकि, कोर्ट ने तकनीक का सहारा लेते हुए पत्नी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालती कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति दी है।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता श्रीमती रंजना चौकसे (उर्फ श्रीम चौकसे) ने नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने गाडरवारा (नरसिंहपुर) के तृतीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में लंबित तलाक के मामले (RCSHM No. 39/2025) को प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, नर्मदापुरम में स्थानांतरित करने की मांग की थी।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, पक्षकारों का विवाह 19 अप्रैल 2024 को गाडरवारा में संपन्न हुआ था और 19 फरवरी 2025 को उन्हें एक संतान की प्राप्ति हुई। वैवाहिक विवाद उत्पन्न होने के बाद, प्रतिवादी पति (वैभव राय) ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत गाडरवारा फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता पत्नी की ओर से अधिवक्ता सर्वेश कुमार जायसवाल ने तर्क दिया कि वह वर्तमान में नर्मदापुरम में अपने मायके में रह रही हैं और पूरी तरह से अपने परिवार पर निर्भर हैं। नर्मदापुरम और गाडरवारा के बीच की दूरी लगभग 150 किलोमीटर है। अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता के पास एक छोटा बच्चा है, जिसके साथ अकेले यात्रा करना उनके लिए अत्यधिक कठिन है। यह भी दलील दी गई कि एक महिला होने के नाते उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार स्थान पर केस लड़ने का अधिकार है।
इसके विपरीत, प्रतिवादी पति की ओर से अधिवक्ता प्रशांत कुमार तिवारी ने स्थानांतरण का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि तलाक की याचिका ‘क्रूरता’ (Cruelty) के आधार पर दायर की गई है, जिसे साबित करने के लिए गाडरवारा में ही साक्ष्य और गवाह उपलब्ध हैं, क्योंकि घटनाएं वहीं हुई थीं। उन्होंने कहा कि केवल पत्नी की सुविधा ही केस ट्रांसफर का आधार नहीं हो सकती। पति ने यह भी आश्वासन दिया कि वह पत्नी के आने-जाने का खर्च (Commutation expenses) वहन करने को तैयार है। साथ ही यह आरोप लगाया गया कि मामला गवाही (Evidence) के चरण में है और पत्नी इस याचिका की आड़ में कोर्ट में पेश नहीं हो रही है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, न्यायमूर्ति दीपक खोत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए स्थिति स्पष्ट की। कोर्ट ने अनिंदिता दास बनाम श्रीजीत दास (2006) के मामले का जिक्र किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने माना था कि महिलाओं के प्रति दिखाई गई नरमी का कई बार दुरुपयोग किया गया है और हर याचिका पर उसके गुणों (Merit) के आधार पर विचार होना चाहिए।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने प्रीति शर्मा बनाम मंजीत शर्मा (2005) के मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें यह स्थापित किया गया था कि “महज इसलिए कि याचिकाकर्ता एक महिला है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह यात्रा नहीं कर सकती।”
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“कानून की स्थिति से यह स्पष्ट है कि अब केवल ‘सुविधा’ ही वह उचित कारक नहीं है जो स्थानांतरण के मामले को तय कर सके। यदि मामले को उस स्थान के गवाहों द्वारा साबित किया जाना है जहां मामला चल रहा है, तो दूसरे पक्ष को आने-जाने के खर्च का भुगतान करके समायोजित किया जा सकता है।”
निर्णय और निर्देश
तमाम तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद, हाईकोर्ट ने केस को नर्मदापुरम ट्रांसफर करने से इनकार कर दिया, लेकिन पत्नी की परेशानी को देखते हुए बीच का रास्ता निकाला। कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- याचिकाकर्ता पत्नी गाडरवारा फैमिली कोर्ट के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से उपस्थित हो सकती है।
- हालांकि, जब साक्ष्य (Evidence) दर्ज करने या गवाही की बारी आएगी, तो पत्नी को गाडरवारा कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा।
- गवाही के लिए पत्नी की व्यक्तिगत उपस्थिति के दौरान होने वाला यात्रा खर्च पति द्वारा वहन किया जाएगा।
- फैमिली कोर्ट, गाडरवारा को निर्देश दिया गया है कि वह गवाही की तारीख तय करे और पति को खर्च का भुगतान करने का आदेश दे।
इस प्रकार, हाईकोर्ट ने पत्नी को नियमित तारीखों पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।
केस डीटेल्स (Case Details):
- केस टाइटल: श्रीमती रंजना चौकसे उर्फ श्रीम चौकसे बनाम वैभव राय
- केस नंबर: एम.सी.सी. नंबर 2598 ऑफ 2025 (MCC No. 2598 of 2025)
- कोरम: न्यायमूर्ति दीपक खोत
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री सर्वेश कुमार जायसवाल
- प्रतिवादी के वकील: श्री प्रशांत कुमार तिवारी

