उत्तराखंड हाईकोर्ट ने खाली पदों की जानकारी मांगी; नियमित भर्ती न करने पर सरकार को फटकार

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सरकारी विभागों में स्वीकृत खाली पदों की जानकारी देने का निर्देश देते हुए नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू न करने पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने मुख्य सचिव को सभी विभागों से स्वीकृत रिक्तियों का ब्योरा एकत्र कर शपथपत्र के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश करने का आदेश दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने 9 जनवरी को उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें विभिन्न विभागों में स्वीकृत पदों के बावजूद नियमित नियुक्ति न किए जाने का मुद्दा उठाया गया था।

कोर्ट ने कहा कि कई याचिकाओं में यह तथ्य सामने आया है कि सरकार के पास बड़ी संख्या में पद खाली होने के बावजूद नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं की जा रही है।

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कोर्ट ने सवाल उठाया—”जब पद स्वीकृत हैं और उपलब्ध हैं, तो सरकार उन्हें क्यों नहीं भर रही है?” कोर्ट ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताया।

याचिका में कहा गया कि सरकार जानबूझकर संविदा, अस्थायी और एड-हॉक नियुक्तियों के माध्यम से पद भर रही है, जबकि स्थायी पद उपलब्ध हैं। यह प्रक्रिया “शोषणकारी, मनमानी और तर्कहीन” है और संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन है।

इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के भाग IV में निहित राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों के भी विरुद्ध बताया।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि बड़ी संख्या में योग्य और पात्र युवक नियमित नियुक्तियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक निष्क्रियता के चलते कई उम्मीदवार आयु सीमा पार कर जाते हैं।

कोर्ट ने कहा कि स्वीकृत पदों को संविदा, दैनिक वेतन या एड-हॉक आधार पर भरना बेहद चिंताजनक है।

कोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे सभी विभागों से स्वीकृत और रिक्त पदों की जानकारी जुटाएं और यह स्पष्ट करें कि जब नियमित, स्थायी और स्वीकृत पद उपलब्ध हैं, तो नियमित भर्ती प्रक्रिया क्यों नहीं शुरू की जा रही है।

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साथ ही, कोर्ट ने यह भी पूछा कि चतुर्थ श्रेणी के पदों को ‘डेड कैडर’ क्यों घोषित कर दिया गया है।

कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 16 फरवरी 2026 को तय की है। हाईकोर्ट के इन निर्देशों से राज्य की भर्ती नीति और सरकारी विभागों में नियुक्तियों की पारदर्शिता पर बड़ा असर पड़ सकता है।

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